मुनाजाते आरेफ़ीन

बारहवीं दुआ

मुनाजाते आरेफ़ीन

بِسْمِ اﷲِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

إلھِی قَصُرَتِ الْاَلْسُنُ عَنْ بُلُوغِ ثَنائِکَ کَما یَلِیقُ بِجَلالِکَ، وَعَجَزَتِ الْعُقُولُ عَنْ إدْراکِ کُنْہِ جَمالِکَ، وَانْحَسَرَتِ الْاَ بْصارُ دُونَ النَّظَرِ إلی سُبُحاتِ وَجْھِکَ، وَلَمْ تَجْعَلْ لِلْخَلْقِ طَرِیقاً إلَی مَعْرِفَتِکَ إلاَّ بِالْعَجْزِ عَنْ مَعْرِفَتِکَ إلھِی فَاجْعَلْنا مِنَ الَّذِینَ تَرَسَّخَتْ ٲَشْجارُ الشَّوْقِ إلَیْکَ فِی حَدائِقِ صُدُورِھِمْ وَٲَخَذَتْ لَوْعَۃُ مَحَبَّتِکَ بِمَجامِعِ قُلُوبِھِمْ، فَھُمْ إلَی ٲَوْکارِ الْاَفْکارِ یَٲْوُونَ، وَفِی رِیاضِ الْقُرْبِ وَالْمُکاشَفَۃِ یَرْتَعُونَ، وَمِنْ حِیَاضِ الْمَحَبَّۃِ بِکَٲْسِ الْمُلاطَفَۃِ یَکْرَعُونَ، وَشَرائِعَ الْمُصافاۃِ یَرِدُونَ قَدْ کُشِفَ الْغِطائُ عَنْ ٲَبْصارِھِمْ وَانْجَلَتْ ظُلْمَۃُ الرَّیْبِ عَنْ عَقَائِدِھِمْ وَضَمَائِرِھِمْ وَانْتَفَتْ مُخَالَجَۃُ الشَّکِّ عَنْ قُلُوبِھِمْ وَسَرَائِرِھِمْ، وَانْشَرَحَتْ بِتَحْقِیقِ الْمَعْرِفَۃِ صُدُورُھُمْ، وَعَلَتْ لِسَبْقِ السَّعَادَۃِ فِی الزَّھَادَۃِ ھِمَمُھُمْ، وَعَذُبَ فِی مَعِینِ الْمُعَامَلَۃِ شِرْبُھُمْ، وَطَابَ فِی مَجْلِسِ الاَُْنْسِ سِرُّھُمْ، وَٲَمِنَ فِی مَوْطِنِ الْمَخَافَۃِ سِرْبُھُمْ، وَاطْمَٲَ نَّتْ بِالرُّجُوعِ إلَی رَبِّ الْاَرْبابِ ٲَنْفُسُھُمْ، وَتَیَقَّنَتْ بِالْفَوْزِ وَالْفَلاَحِ ٲَرْواحُھُمْ، وَقَرَّتْ بِالنَّظَرِ إلَی مَحْبُوبِھِمْ ٲَعْیُنُھُمْ، وَاسْتَقَرَّ بِ إدْرَاکِ السُّؤْلِ وَنَیْلِ الْمَٲْمُولِ قَرارُھُمْ، وَرَبِحَتْ فِی بَیْعِ الدُّنْیا بِالاَْخِرَۃِ تِجَارَتُھُمْ ۔

आरम्भ करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और अत्यन्त दयावान है।

हे मेरे रब तेरी शान की जलालत के कारण तेरी प्रशंसा करने से ज़बानें गूंगी हैं और तेरे जमाल की वास्तविकता को समझने से लोगों की अक़्लें दूर हैं और तेरी हस्ती के जलवों की तरफ़ देखने से आखें मजबूर हो कर रह जाती हैं, और लोगों के लिये तेरी मारेफ़त (पहचान) की प्राप्ति केवल यही है कि वह तेरी मारेफ़त प्राप्त करने में असमर्थ हैं, मेरे मालिक मुझे उन लोगों में क़रार दे जिनके सीनों को बाग़ों में तेरे शौक़ के वृक्ष जड़ पकड़ चुके हैं और तेरी मोहब्बत के दर्द ने उनके दिलों को घेरा हुआ है अब वह यादों के आशियाने में पनाह लिये हुए हैं, और तेरी नज़दीकी और जलवे के बाग़ों में सैर कर रहे हैं वह तेरी मोहब्बत के स्रोतो से मोहब्बत के जाम के घूंट पी रहे हैं और साफ़ सुथरे घाटों पर दाख़िल हैं, उनकी आखों से पर्दा उठ चुका है और शंका की स्याही उनके अक़ीदों और आत्माओं से दूर हो गई है उनके दिलों और बातिनो से शंका के प्रभाव समाप्त हो गए हैं, और सही मारेफ़त हासिल होने से उनके सीने खुल चुके हैं, और सौभाग्य के लिया ज़ोहद में उनकी हिम्मतें बढ़ गई हैं, और किरदार के स्रोत में उनका पीना मीठा है और मोहब्बत की सभा में उनकी आत्मा पवित्र है, और भयंकर स्थानों पर उनका गुट सुरक्षित है, और पालने वालों के पालने वाले की तरफ़ वापस आने से उनकी आत्माएं संतुष्ट हैं, और उनकी आत्माओं को बख़्शिश और कामियाबी का विश्वास है, और उनकी आँखे महबूब के दीदार से ठंडी हैं, और उनको हाजतें पूरी होने और मुरादें पूर्ण हो जाने से क़रार हासिल है, आख़ेरत के स्थान पर दुनिया बेचने से उनका सौदा लाभदायक है,

إلھِی مَا ٲَلَذَّ خَواطِرَ الْاِلْہامِ بِذِکْرِکَ عَلَی الْقُلُوبِ وَمَا ٲَحْلَیٰ الْمَسِیرَ إلَیْکَ بِالْاَوْہامِ فِی مَسالِکِ الْغُیُوبِ وَمَا ٲَطْیَبَ طَعْمَ حُبِّکَ وَمَا ٲَعْذَبَ شِرْبَ قُرْبِکَ، فَٲَعِذْنا مِنْ طَرْدِکَ وَ إبْعادِکَ، وَاجْعَلْنا مِنْ ٲَخَصِّ عَارِفِیکَ وَٲَصْلَحِ عِبَادِکَ وَٲَصْدَقِ طَائِعِیکَ وَٲَخْلَصِ عُبَّادِکَیَا عَظِیمُ یَا جَلِیلُ، یَا کَرِیمُ یَا مُنِیلُ، بِرَحْمَتِکَ وَمَنِّکَ یَا ٲَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ ۔

मेरे मालिक क्या स्वाद है उन ख़्यालों में जो तेरे ज़िक्र से दिलों में आते हैं, और कितनी मीठी है तेरी तरफ़ से वह यात्रा जो अपने ख़्याल से ग़ैब के रास्तों पर जारी है, और कितना अच्छा है तेरी मोहब्बत का स्वाद, और कितना मीठी है तेरी नज़दीकी का शरबत, बस बचा हमें कि हम तेरे यहां से दूर कर दिये जाएं और तुझसे दूर रहें, हमें अपने व्यक्तिगत आरिफ़ों और बेहतरीन बंदों में क़रार दे और अपने सच्चे अनुयायियों और खरे इबादत करने वालों में रख हे महान, हे जलाल वाले, हे उदार हे देने वाले तुझे तेरी कृपा और एहसान का वास्ता है हे सबसे अधिक रहम करने वाले।

(अनुवादकः सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी)

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