इबादत की क़िसमें इमाम अली (अ) की नज़र में
इबादत की क़िसमें इमाम अली (अ) की नज़र में
इमाम अली अलैहिस सलाम नहजुल बलाग़ा में इबादत करने वालों की तीन क़िस्में बयान फ़रमाते हैं:
इन्ना क़ौमन अबदुल्लाहा रग़बतन फ़ तिलका इबादतुत तुज्जार.......। (1)
कुछ लोग ख़ुदा की इबादत इन्आम के लालच में करते हैं यह व्यापारियों की इबादत है और कुछ लोग ख़ुदा की इबादत हर की वजह से करते हैं यह ग़ुलामों की इबादत है और कुछ लोग ख़ुदा की इबादत उस का शुक्र बजा लाने के लिये करते हैं यह आज़ाद और ज़िन्दा दिल लोगों की इबादत हैं।
इस फ़रमान में इमाम अली अलैहिस सलाम ने इबादत को तीन क़िस्मों में बांटा है।
पहली क़िस्म: व्यापारियोंकी इबादत
यानी कुछ लोग रग़बत और इन्आम के लालच में ख़ुदा की इबादत करते हैं। इमाम (अ) फ़रमाते हैं कि यह हक़ीक़ी इबादत नही है बल्कि यह ताजिरों की तरह ख़ुदा से मामला चाहता है जैसे व्यापारियों की सारी सोंच केवल लाभ और हानि के बारे में होती है और इसके अलावा वह किसी चीज़ के बारे में नहीं सोंचते हैं उसी तरह से यह आबिद जो इस नीयत से ख़ुदा के सामने झुकता है दर अस्ल ख़ुदा की अज़मत का इक़रार नही करता बल्कि फ़क़त अपने इन्आम के पेशे नज़र झुक रहा होता है।
दूसरी क़िस्म: ग़ुलामों की इबादत
इमाम अलैहिस सलाम फ़रमाते हैं कि कुछ लोग ख़ुदा के ख़ौफ़ से उस की बंदगी करते हैं यह भी सच्ची इबादत नही है बल्कि ग़ुलामों की इबादत है जैसे एक ग़ुलाम मजबूरन अपने मालिक की इताअत करता है उस की अज़मत उस की नज़र में नही होती। यह आबिद भी गोया ख़ुदा की अज़मत का मोअतरिफ़ नही है बल्कि मजबूरन ख़ुदा के सामने झुक रहा है।
तीसरी क़िस्म: हक़ीक़ी इबादत
इमाम अलैहिस सलाम फ़रमाते हैं कि कुछ लोग ऐसे हैं जो ख़ुदा की इबादत और बंदगी उस की नेंमतों का शुक्रिया अदा करने के लिये बजा लाते हैं, फ़रमाया कि यह हक़ीक़ी इबादत है। चूँ कि यहाँ इबादत करने वाला अपने मोहसिन व मुनईमे हकी़क़ी को पहचान कर और उस की अज़मत की मोअतरिफ़ हो कर उस के सामने झुक जाता है जैसा कि कोई अतिया और नेमत देने वाला वाजिबुल इकराम समझा जाता है और तमाम दुनिया के ग़ाफ़िल इंसान उस की अज़मत को तसलीम करते हैं। इसी अक़ली क़ानून की बेना पर इमाम अलैहिस सलाम फ़रमाते हैं कि जो शख़्स उस मुनईमे हक़ीक़ी को पहचान कर उस के सामने झुक जाये। उसी को आबिदे हक़ीक़ी कहा जायेगा और यह इबादत की आला क़िस्म है।
नुकता
ऐसा नही है कि पहली दो क़िस्म की इबादत बेकार है और उस का कोई फ़ायदा नही है हरगिज़ ऐसा नही है बल्कि इमाम अलैहिस सलाम इबादत की श्रेणियों को बयान फ़रमाना चाहते हैं। अगर कोई पहली दो क़िस्म की इबादत बजा लाता है तो उस को उस इबादत का सवाब ज़रुर मिलेगा। लेकिन उच्च श्रेणी की इबादत से वह शख़्स महरुम रह जाता है। चूँ कि बयान हुआ कि आला इबादत तीसरी क़िस्म की इबादत है।
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(1) नहजुल बलाग़ा हिकमत 237
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