इमाम मोहम्मद तक़ी की दस हदीसें
इमाम मोहम्मद तक़ी की दस हदीसें
بسم الله الرحمن الرحیم
۱۔ قالَ الإمام الجواد علیه السلام
مَنْ أصْغی إلی ناطِق فَقَدْ عَبَدَهُ، فَإنْ كانَ النّاطِقُ عَنِ اللهِ فَقَدْ عَبَدَاللهَ، وَ إنْ كانَ النّاطِقُ یَنْطِقُ عَنْ لِسانِ إبلیس فَقَدْ عَبَدَ إبلیس۔
1. जो भी किसी कहने वाले की बात को सुने और उस पर ध्यान दे, यह ऐसा ही है जैसे उसने उसकी पूजा की हो, तो अगर वह कहने वाला ईश्वरीय हो (ख़ुदा की बात कहता हो) तो उसने ख़ुदा की इबादत की है, और अगर कहने वाला शैतान की ज़बान बोल रहा हो तो उसने शैतान की पूजा की है।
۲۔ قال له رجلٌ: أوصِنی
قال علیه السلام: و تَقَبَّل؟
قال: نعم. قالَ علیه السلام:
تَوَسَّدِ الصَّبْرَ، وَ اعْتَنِقِ الْفَقْرَ، وَ ارْفَضِ الشَّهَواتِ، وَ خالِفِ الْهَوی، وَ اعْلَمْ أنَّكَ لَنْ تَخْلُو مِنْ عَیْنِ اللهِ، فَانْظُرْ كَیْفَ تَكُونُ۔
2. एक व्यक्ति ने इमाम जवाद से कहा मुझे नसीहत कीजिए, आपने फ़रमायाः क्या (नसीहत) स्वीकार करोगे? उसने कहाः हां, आपने फ़रमायाः धीरज और सब्र को अपनी तकिया बनाओ, और ग़रीबी को आग़ोश में ले लो, और शहवतों (इच्छाओं) को दूर फेंक दो, और नफ़्स की ख़्वाहिशों का विरोध करो, और जान लो कि तुम कभी भी ख़ुदा की आँख से ओझल नहीं हो, तो ध्यान रखों कि क्या कर रहे हो।
۳۔ قالَ علیه السلام:
الْمُؤمِنُ یَحْتاجُ إلی ثَلاثِ خِصال: تَوْفیق مِنَ اللهِ عَزَّ وَ جَلَّ، وَ واعِظ مِنْ نَفْسِهِ، وَ قَبُول مِمَّنْ یَنْصَحُهُ۔
3. मोमिन को तीन चीज़ की आवश्यक्ता होती है
1. ख़ुदा की तरफ़ से तौफ़ीक़।
2. अपने आप को नसीहत करने वाला हो।
3. जो भी उसको नसीहत करे उसको स्वीकार करे।
۴۔ قال علیه السلام:
أَوْحَی اللّهُ إِلی بَعْضِ الاْنْبِیاءِ: أَمّا زُهْدُکَ فِی الدُّنْیا فَتُعَجِّلُکَ الرّاحَةَ، وَ أَمّا إِنْقِطائُکَ إِلَیَّ فَیُعَزِّزُکَ بی، وَ لکِنْ هَلْ عادَیْتَ لی عَدُوًّا وَ والَیْتَ لی وَلِیًّا۔
4. ख़ुदा ने एक नबी पर वही (आकाशवाणी) कीः तुम्हारा दुनिया से ज़ोहद और उससे दूरी, तुम्हारी राहत और आराम की तरफ़ तेज़ी है, और तुम्हारा मेरी तरफ़ आना मेरे नज़दीक तुम्हारी इज़्ज़त और सरदारी है,
लेकिन क्या तुमने मेरे दुश्मन से दुश्मनी और मेरे दोस्त से दोस्ती की है?
(यानी क्या तुमने तवल्ला और तबर्रा किया है)
۵۔ قال علیه السلام:
مَنْ غَلَبَ جَزَعُهُ عَلی صَبْرِهِ حَبِطَ أَجْرُهُ؛
5. जिसकी बेताबी और फ़रयाद उसके धैर्य से आगे निकल जाए उसका सवाब बरबाद हो जाता है।
۶۔ قال علیه السلام:
تَأخیرُ التَّوْبَةِ إِغْتِرارٌ وَ طُولُ التَّسْویفِ حَیْرَةٌ، وَ الاْعْتِذارُ عَلَی اللّهِ هَلَکَةٌ وَ الاِْصْرارُ عَلَی الذَّنْبِ أَمْنٌ لِمَکْرِ اللّهِ «فَلا یَأْمَنُ مَکْرَ اللّهِ إِلاَّ الْقَوْمُ الْخاسِرُونَ»؛(سوره اعراف، آیه 99}
6. तौबा में देरी करना धोखा खाना है, और अधिक आज, कल करना भटकना है, और ख़ुदा के मुक़ाबले में बहानेबाज़ी हलाकत और बरबादी है, पाप पर ज़िद (बार बार पाप करना और तौबा न करना) ख़ुदा की तदबीर (नीति) से ग़ाफ़िल रहना है (और ख़ुदा की तदबीर से वही ग़ाफ़िल रहता है जो हानि उठाने वाला है।)
۷۔ قال علیه السلام:
«إِظْهارُ الشَّیْءِ قَبْلَ أَنْ یُسْتَحْکَمَ مَفْسَدَةٌ لَهُ.»
7. मज़बूत और शक्तिशाली होने से पहले किसी चीज़ को ज़ाहिर करना उसकी बरबादी का कारण होता है।
۸۔ قال علیه السلام:
«مُلاقاتُ الاْخْوانِ نَشْرَةٌ وَ تَلْقیحٌ لِلْعَقْلِ وَ إِنْ کانَ نَزْرًا قَلیلاً.»
8. हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी कहते हैं: मैंने इमाम जवाद (अ) से सुना कि आपने फ़रमायाः दीनी भाई से मुलाक़ात सुकून सोंच में ठहराव का कारण है इसी प्रकार अक़्ल के बढ़ने का कारण होता है चाहे बहुत कम ही हो।
۹۔ قال علیه السلام:
«إِیّاکَ وَ مُصاحَبَةَ الشَّریرِ فَإِنَّهُ کَالسَّیْفِ الْمَسْلُولِ یَحْسُنُ مَنْظَرُهُ وَیَقْبَحُ أَثَرُهُ.»
9. बुरे और शरारती लोगों से दोस्ती और उठने बैठने से बचो, क्योंकि वह खिंची हुई तलवार की तरह है जिसको देखना अच्छा है लेकिन उसका प्रभाव बहुत बुरा है।
۱۰۔ قال علیه السلام:
«کَیْفَ یُضیِّعُ مَنْ أَللّهُ کافِلُهُ، وَ کَیْفَ یَنْجُوا مَنْ أَللّهُ طالِبُهُ وَ مَنِ انْقَطَعَ إِلی غَیْرِ اللّهِ وَکَلَهُ اللّهُ إِلَیْهِ.»
10. वह कैसे अकेला रह सकता है और बरबाद हो सकता है जिसका अल्लाह कफ़ील हो? और वह कैसे भाग सकता है जिसका ख़ुदा पीछा कर रहा हो? और जो भी ख़ुदा के अतिरिक्त किसी दूसरे की तरफ़ जाए ख़ुदा उसको उसी के हवाले कर देता है।
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