ज्ञान और विज्ञान का प्रसार करने वाले इमाम बाक़िरुल उलूम के जीवन पर संक्षिप्त नज़र

ज्ञान और विज्ञान का प्रसार करने वाले इमाम बाक़िरुल उलूम के जीवन पर संक्षिप्त नज़र

पहली रजब 57 हिजरी कमरी को पवित्र नगर मदीना के शांतपूर्ण वातावरण में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के घर में इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ही वह महान हस्ती हैं जिन्होंने विभिन्न ज्ञानों को एक दूसरे से अलग किया और ज्ञान के अपने अथाह सागर से ज्ञान के प्यासे लोगों की प्यास बुझाई।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम ने इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के पैदा होने की शुभ सूचना बारम्बार दी थी। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का नाम पैग़म्बरे इस्लाम के नाम पर था और सदगुणों में वे पूर्णरूप से पैग़म्बरे इस्लाम के प्रतीक थे।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की सबसे प्रसिद्ध उपाधि बाक़िरूल ऊलूम अर्थात ज्ञानों को चीरने वाला है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के दादा और इमाम हसन अलैहिस्सलाम उनके नाना थे। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की एक विशेषता है कि उन्हें शीया संस्कृति की क्रांति की आधार शिला रखने वाला माना जाता है। यद्यपि ज्ञान के प्रचार प्रसार को मुख्य रूप से इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम से जोड़ा जाता है परंतु  उसकी बुनियाद इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम ने भी रखी थी। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों में से हर एक अपने समय और परिस्थिति के अनुसार अमल करता था। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के काल में राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थिति इस प्रकार से थी कि उन्हें दूसरे इमामों की अपेक्षा धार्मिक शिक्षाओं, पवित्र कुरआन की व्याख्या और पैग़म्बरे इस्लाम की परंमरा को बयान करने का अधिक  अवसर मिला।

ज़ोहद अर्थात दुनिया से मुंह मोड़ लेना, निष्ठा और दूसरे समस्त सदगुणों ने इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को एक प्रतिभाशाली और विशिष्ट हस्ती में परिवर्तित कर दिया था।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने पवित्र कुरआन का अनुसरण करके समाज में ज्ञान का स्थान इस प्रकार चित्रित किया कि लोग धर्म को पहचानें और जीवन में आवश्यक ज्ञानों को प्राप्त करें। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने मानव समाज का मार्गदर्शन ज्ञान की ओर किया और फरमाते थे कि जो विद्वान अपने ज्ञान से समाज को लाभ पहुंचाये वह ७० हज़ार उपासकों से बेहतर है

जिस प्रकार ज्ञान की विशेषता इस्लाम धर्म में बयान की गयी है उस तरह किसी अन्य धर्म में बयान नहीं की गयी है। अलबत्ता इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि ज्ञान के संबंध में जो यह कहा गया गया है कि जो विद्वान अपने ज्ञान से समाज को लाभ पहुंचाये वह ७० हज़ार उपासकों से बेहतर है तो यह कथन उस महान हस्ती का है जो उपासना और बंदगी के चरम शिखर पर है। यह उस व्यक्ति का कथन नहीं है जो धर्म से परिचित न होने या धार्मिक मूल्यों से शत्रुता के कारण ज्ञान के महत्व को बयान कर रहा हो। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ज्ञान के महत्व के बारे में अपने इस मूल्यवान कथन से समाज को ईश्वरीय भय के बिना उपासना, ज्ञान के बिना अमल तथा  आत्मा से रिक्त उपासना से रोकना चाहते हैं और वे लोगों को पूर्ण जानकारी एवं वास्तविक बंदगी की ओर आमंत्रित करना चाहते हैं। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम इसी प्रकार अपनी मूल्यवान सिफारिश में  शत्रु से मुकाबला करने में ज्ञान के महत्व की ओर संकेत करते हुए कहते हैं ” ज्ञान शत्रुओं के विरुद्ध हथियार है और इमामों तथा ईश्वरीय दूतों को इसी मूल्यवान मापदंड के आधार पर दूसरों पर श्रेष्ठता प्राप्त है और उन्हें लोगों का मार्गदर्शक बनाया गया है”

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का पावन जीवन एक परिपूर्ण मनुष्य के जीवन का उच्चतम आदर्श है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की एक विशेषता उनके अंदर समस्त सदगुणों का एकत्रित हो जाना है। ज्ञान के संबंध में उनका जो ध्यान है वह नैतिक व आध्यात्मिक विशेषताओं से उन्हें निश्चेत नहीं करता। इसी तरह इमाम अध्यात्म और महान ईश्वर की उपासना पर जो ध्यान देते हैं वह इस बात का बाधा नहीं बनता है कि इमाम सामाजिक एवं मनुष्य के भौतिक जीवन पर ध्यान न दें। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के जीवन पर दृष्टि डालने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इमाम जीवन के समस्त क्षेत्रों में सर्वोच्च आदर्श हैं। वे ज्ञान एवं सदगुणों के शिखर बिन्दु पर थे। इस प्रकार से कि शीया और सुन्नी सहित समस्त विद्वान इस बात पर एकमत थे कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम अपने समय में समस्त विशेषताओं में सबसे अच्छे व श्रेष्ठ थे। सुन्नी विद्वान व परिज्ञानी अत्तार नीशापुरी अपनी पुस्तक “तज़केरतुल औलिया” में “इमाम को नबी की औलाद” और हज़रत अली की निर्वाचित नस्ल के रूप में याद करता है।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के नमाज़ पढ़ने के बारे में इतिहास में आया है कि जब इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम नमाज़ के लिए खड़े होते थे तो कभी उनका पावन व तेजस्वी चेहरा लाल हो जाता था और कभी पीला पड़ जाता था और इस प्रकार का हो जाता था कि मानो अपने संबोधक को वे अपनी आंखों से देख रहे हैं और अपने पालनहार से बातें कर रहे हैं। जिन लोगों ने अपनी हज यात्रा के दौरान इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम को देखा था उन्होंने इस प्रकार बयान किया है ” इमाम गुस्ल अर्थात स्नान करते थे, नंगे पैर काबे के क्षेत्र में प्रविष्ठ होते थे और जब काबे के पास पहुंच जाते थे तो उसकी ओर देखते और ऊंची आवाज़ में रोते थे। उसके बाद काबे की परिक्रमा करते थे और नमाज़ के बाद सज्दा करते थे अर्थात ज़मीन पर माथा रख कर महान ईश्वर का गुणगान करते थे और जब सज्दे से सिर उठाते थे तो सज्दा करने का स्थान भीगा होता था। ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि इमाम जहां ईश्वरीय भय, उपासना और बंदगी में चरम शिखर पर थे वहीं काम भी करते थे। इमाम इस बात को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि दूसरे उनकी आजीविका की पूर्ति करें। यही नहीं जब कोई व्यक्ति इमाम से पैसा मांगता था तो इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम प्रसन्न होकर उसकी सहायता करते थे। इस प्रकार से कि इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम के बारे में कहा गया है कि कदापि नहीं सुना गया कि किसी ने इमाम से सवाल किया हो और इमाम ने उसका  नकारात्मक उत्तर दिया हो।

इमाम मोहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम अपनी आजीविका स्वयं कमाने पर बल देते थे परंतु कभी भी उन्होंने जीवन को आजीविका कमाने के लिए समर्पित नहीं किया बल्कि उनका प्रयास समाज में प्रभावी व रचनात्मक उपस्थिति का होता था। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम अपने समय में ज्ञान संबंधी सभाओं का आयोजन करते थे क्योंकि यह समाज को लाभ पहुंचाने का एक बहुत अच्छा तरीक़ा है। क्योंकि हर प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिपूर्णता वैचारिक व सांस्कृतिक परिपूर्णता पर निर्भर है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की समाज में महत्वपूर्ण उपस्थिति को बयान करने के लिए इस बिन्दु का उल्लेख करना काफी है कि इमाम मोहम्मद बाक़िर और उनके बाद उनके बेटे इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम ने शैक्षिक केन्द्रों की आधार शिला रखी और जिन लोगों ने इन शिक्षा केन्द्रों से ज्ञान अर्जित किया उन्होंने लगभग ६ हज़ार किताबें लिखी हैं। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम पवित्र कुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम की जीवन की परम्परा से पूर्णतः अवगत थे और वे लोगों को इससे अवगत करते थे और उन्हें अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश में ले आते थे।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के एक अनुयाई अबू हमज़ा सोमाली कहते हैं ” एक बार मैं मस्जिदे नबी में बैठा हुआ था कि एक आदमी मेरे पास आया और उसने मुझे सलाम किया और कहा क्या तुम अबू जाफर मोहम्मद बिन अली को पहचानते हो? मैंने कहा हां मैं उन्हें पहचानता हूं तुम्हें उनसे क्या काम है? उसने कहा कि मैंने उनसे पूछने के लिए चालिस सवाल तैयार कर रखा है और जो सही होगा उसे स्वीकार करूंगा। उसी समय इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का आगमन हुआ और उस समय दूसरे लोग थी उनके पास थे और वे हज से संबंधित प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। वह आदमी भी इमाम के निकट बैठ गया और उसने अपने प्रश्न भी इमाम के समक्ष रख दिये और इमाम ने उसके चालिस प्रश्नों के उत्तर दिये।

अपने बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों से प्रेम, वह भी धार्मिक व ईश्वरीय मूल्यों को दृष्टि में रखकर, एसी चीज़ है जिसे सही रूप में केवल पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों की जीवनी में ही देखा जा सकता है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के पावन जीवन में हर चीज़ पर उसके स्थान पर ध्यान दिया गया है। उनमें से एक धर्मपत्नियों की आत्मिक व आध्यात्मिक आवश्यकताएं हैं जिन पर आम तौर पर लोगों के जीवन में ध्यान नहीं दिया जाता है परंतु इमामों के जीवन में एक वास्तविकता के रूप में उस पर ध्यान दिया गया है। बसरा के रहने वाले हसन ज़ियात कहते हैं मैं अपने एक साथी के साथ इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के घर पर गया। अपेक्षा के विपरीत उन्हें एक एसे कमरे में देखा जिसमें फर्श बिछा हुआ था और सजाया गया था। हमने देखा कि उनके कांधों पर एक कपड़ा है जिस पर लाल रंग के फूल कढे हुए हैं। हमने अपनी बात उनके समक्ष रखी, अपने प्रश्नों को उनसे पूछा और वहां से उठ गये।

जब मैं इमाम के घर से निकल रहा था तो उन्होंने मुझसे फरमाया कल भी अपने दोस्त के साथ हमारे पास आना मैंने कहा बहुत अच्छा है कल भी आऊंगा। दोबारा मैं अपने उसी दोस्त के साथ इमाम के घर गया परंतु जब हम इस बार इमाम के घर पहुंचे तो एसे कमरे में गये जिसमें एक चटाई के सिवा कुछ और नहीं था। इमाम खुरदरा कपड़े का एक लैबा कुर्ता पहने हुए थे। उस समय इमाम ने हमारे दोस्त की ओर रुख करके फरमाया” हे बसरी के भाई! जो कमरा तुमने कल देखा था और वहां पर तुम मेरे पास आये थे वह मेरी धर्मपत्नी से संबंधित था कि अभी जल्द ही मैंने उससे विवाह किया है और वास्तव में वह उसका कमरा था और जो चीज़ें तुमने देखा था उन्हें वही लायी है। उम्मीद है कि जो कुछ तूने कल देखा था उससे अपने दिल में बुरा खयाल नहीं करोगे। मेरे साथी ने इमाम के उत्तर में कहा ईश्वर की सौगन्द मेरे दिल में बुरा खयाल आ गया था और अब ईश्वर ने उस बुरे खयाल को मेरे दिल से समाप्त कर दिया है और मैंने वास्विकता समझ ली है” इससे यह वास्तविकता सिद्ध होती है कि इमाम व्यक्तिगत जीवन में एश्वर्य से दूर रहते हैं परंतु सामाजिक व पारिवारिक मामलों और धर्मपत्नियों की भावनात्मक व आध्यात्मिक आवश्यकताओं पर ध्यान देते हैं और वे वैध सुन्दरता को हराम नहीं समझते तथा कुछ अवसरों पर उसे आवश्यक भी समझते हैं।

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