इमाम मूसा क़ाज़िम अलैहिस्सलाम के कथन संक्षिप्त विवरण के साथ

इमाम मूसा क़ाज़िम अलैहिस्सलाम के कथन संक्षिप्त विवरण के साथ

अनुवादकः सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

लोगों पर ख़ुदा की हुज्जत

قال الکاظم علیه السلام إِنَّ لِلّهِ عَلَی النّاسِ حُجَّتَینِ، حُجَّةً ظاهِرَةً وَ حُجَّةً باطِنَةً، فَأمّا الظّاهِرَةُ فَالرُّسُلُ وَ الاَْنْبِیاءُ وَ الاَْئِمَّةُ وَ أَمَّا الْباطِنَةُ فَالْعُقُولُ.

इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः जान लो कि ख़ुदा ने लोगों पर दो प्रकार की हुज्जत रखी हैं: ज़ाहिर हुज्जत और बातिन हुज्जत, ज़ाहिर हुज्जत रसूल, नबी और इमाम हैं और बातिन हुज्जत अक़्लें हैं।

ईश्वर ने हर इन्सान को पैदा किया और उसको फ़ितरत दी और यह इन्सान की फ़ितरत ही है जो उसको ख़ुदा तक पहुंचाती है

यहां पर लोग सदैव प्रश्न करते हैं कि वह लोग जिनके पास कोई नबी नहीं पहुंचा कोई आलिम नहीं पहुंचा जिनके किसी ने दीन धर्म और ईश्वर के बारे में नहीं बताया, वह लोग जो संसार के उन कोनों में रहते हैं जहां कोई गया ही नहीं तो वह लोग ईश्वर को कैसे पहचानेंगे वह धर्म का ज्ञान किस प्रकार प्राप्त करेंगे?

तो इसका उत्तर यह है कि ईश्वर ने हर इन्सान के अंदर के पवित्र फ़ितरत रखी हैं और इसी फ़ितरत में यह भी रखा है कि वह सदैव ईश्वर की तलाश में रहती है और वह बताती है कि कोई है जिसने तुमको पैदा किया है और वही ईश्वर है, अगर इन्सान अपनी अक़्ल और फ़ितरत के अनुसार कार्य करे तो वह हिदायत पा  जाएगा इसी प्रकार वह लोग जिन तक कोई नहीं पहुंचा है अगर वह अपनी फ़ितरत पर अमल करें तो वह ईश्वर तक पहुंच जाएंगे

यह बात ध्यान रखना चाहिए कि आख़ेरत के दिन ईश्वर हर इन्सान से उसके ज्ञान और मारेफ़त के अनुसार हिसाब करेगा, वह इन्सान जो अमेज़न के जंगलों में रहता है और वह जो किसी बड़े सिटी में रहता है न उन दोनों का ज्ञान एक जैसा  है और न ही मारेफ़त और ना ही उनका हिसाब एक जैसा होगा।

जैसा कि ईश्वर क़ुरआन में फ़रमाता है

وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّىٰ نَبْعَثَ رَ‌سُولًا

नुक्ते

1. यह धरती कभी भी ईश्वर के प्रतिनिधि से ख़ाली नहीं हो सकती है, और यह ईश्वर का कार्य है कि हर ज़माने में कोई न कोई प्रतिनिधि मौजूद रहे और पैग़म्बरों के समाप्त हो जाने के बाद इमामत के होने की सबसे बड़ी दलील यही है।

2. ईश्वर ने अपने दीन को बेकार नहीं छोड़ा है, और ज़रूरत इस बात की है कि कोई हो जो लोगों को उसके दीन की तरफ़ बुलाता रहे जिसके अंदर पैग़म्बर के गुण पाए जाते हो और यह वही इमाम है।

तो नतीजा यह हुआ की हर ज़माने में ख़ुदा की हुज्जत अवश्य हो ती है बस फ़र्क़ यह है कि कभी यह हुज्जत लोगों के सामने होती है और लोग उसके देखते एवं पहचानते हैं और कभी यही हुज्जत ग़ायब होती हैं और लोग उसको नहीं पहचानते हैं जैसे आज के ज़माने में हमारे इमाम हैं, लेकिन यह बात ध्यान रखना चाहिए कि हमारे इमाम ग़ायब है इसका यह अर्थ नहीं है कि वह किसी स्थान पर छिपे हुए हैं, नहीं! बल्कि ग़ायब है का अर्थ यह है कि हम उनको पहचानते नहीं है।

3. इमाम का चुनाव लोगों के हाथ में नहीं है क्योंकि वह एक दूसरे की योग्यताओं से भलिभाती परिचित नहीं है, और यही कारण है कि इमाम का चुनाव ख़ुदा करता है  اللَّـهُ أَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِ‌سَالَتَهُ

मुरव्वत और दीन

قال الکاظم علیه السلام لا دینَ لِمَنْ لا مُرُوَّةَ لَهُ، وَ لا مُرُوَّةَ لِمَنْ لا عَقْلَ لَهُ، وَ إِنَّ أَعْظَمَ النّاسِ قَدْرًا الَّذی لایرَی الدُّنْیا لِنَفْسِهِ خَطَرًا، أَما إِنَّ أَبْدانَكُمْ لَیسَ لَها ثَمَنٌ إِلاَّ الْجَنَّةَ، فَلا تَبیعوها بِغَیرِها.

इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः जिसके अंदर मुरुव्वत नहीं है उसके पास दीन नहीं है, और जिसके पास अक़्ल नहीं है उसके पास मुरुव्वत नहीं है, जान लो कि सबसे बेहतरीन इन्सान वह है जो अपने लिए दुनिया की कोई क़ीमत न समझे, जान लो कि तुम्हारे शरीरों के लिए स्वर्ग से के अतिरिक्त और कोई क़ीमत नहीं है, तो उनको स्वर्ग के अतिरिक्त किसी दूसरी चीज़ से न बेचो।

दीन और अक़्ल में एक प्रकार का इंटरेक्शन पाया जाता है, क्योंकि अक़्ल का सबसे पहला आदेश यह होता है कि इन्सान अपने आप को ख़तरों से बचाए, जैसे कि अगर किसी के सामने कोई बच्चा भी आकर यह कहे कि आपके जूते में बिच्छू है तो अक़्ल यह कहती है कि पहनने से पहले देख लिया जाए, जब्कि हमको पता है कि कहने वाला बच्चा है हो सकता है उनके झूठ बोला हो, हो सकता है कि उसने मज़ाक़ किया हो, लेकिन हम इन सारी संभावनों को नज़अंदाज़ करते हुए इसकी छानबीन करते हैं, क्यों हमारे दिल में यह होता है कि अगर बच्चे ने सही कहा होगा तो हमारी जान को ख़तरा हो सकता है। तो अक़्ल यह कहती है कि जहां पर ख़तरा बड़ा हो वहां छानबीन करनी चाहिए

अब दूसरी तरफ़ देखते हैं कि एक लाख़ से अधिक पैग़म्बर आए सबने कहा कि ईश्वर है, क़यामत है, अमाल का हिसाब किताब होगा, स्वर्ग है नर्क है, सबने नर्क के अज़ाब से डराया है तो अब अक़्ल यह कहती है कि हमको कम से कम छानबीन अवश्य करनी चाहिए क्योंकि अगर कहीं यह लोग सच बोल रहे हुए तो क़यामत में जाने के बाद क्या होगा? ख़तरा बहुत बड़ा है, अगर इन नबियों के बात झूठ हुई तो हमको कोई हानि नहीं होगी लेकिन अगर उनकी बात सही हुई और हमने उसके अनुसार अपने अक़ीदों को सही न किया तो ख़तरा बहुत बड़ा है, इसीलिए अक़्ल यह कहती है कि हमको इस बड़े ख़तरे से बचने के लिए अक़ीदों को सही कर लेना चाहिए

मौत और क़ब्र

قال الکاظم علیه السلام إِذَا مَاتَ الْمُؤْمِنُ بَكَتْ عَلَيْهِ الْمَلَائِكَةُ وَ بِقَاعُ الْأَرْضِ الّتِي كَانَ يَعْبُدُ اللّهَ عَلَيْهَا وَ أَبْوَابُ السّمَاءِ الّتِي كَانَ يُصْعَدُ فِيهَا بِأَعْمَالِهِ وَ ثُلِمَ فِي الْإِسْلَامِ ثُلْمَةٌ لَا يَسُدّهَا شَيْ‏ءٌ لِأَنّ الْمُؤْمِنِينَ الْفُقَهَاءَ حُصُونُ الْإِسْلَامِ كَحِصْنِ سُورِ الْمَدِينَةِ لَهَا

इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः जब मोमिन मरता है तो फ़रिश्ते रोते हैं और वह ज़मीन और स्थान रोता है जहां पर उसने ईश्वर की इबादत की होती है, और आसमान रोतें हैं कि जिनसे वह अपने (नेक) अमल के माध्यम से ऊपर जाता था। और इस्लाम में एक छेद हो जाता है जिसको कोई चीज़ भर नहीं सकती क्योंकि विद्वान मोमिन इस्लाम के क़िले हैं शहर की दीवार की भाति।

इन्सान कभी भी मौत से भाग नही सकता है, जो भागने का प्रयत्न करता है वह केवल अपने आप को धोखा दे रहा है।

कितने आश्चर्य की बात है कि इन्सान सदैव नए घर, नई गाड़ी, नया जीवन, .... आदि के बारे में सोंचता रहता है और कार्य करता रहता है, सब कुछ तो नया होता है, लेकिन जो पुराना हो चुका होता है वह स्वंय इन्सान है, उसकी उमर बीतती जाती है और वह अपनी हर सांस के साथ क़ब्र की तरफ़ बढ़ता रहता है।

दुनिया वाले और आख़ेरत वाले उन पक्षियों की भाति हैं जो पिंजरे में क़ैद हैं जैसे कुछ पक्षी पिंजरे में रहते रहते पिंजरे के इतने आदी हो जाते हैं कि अगर उनको बाहर निकाल भी दिया जाए तो वह वापस पिंजरे में चले जाते हैं इसी प्रकार दुनिया वाले है कि वह दुनिया में रहते रहते इतने आदी हो जाते हैं कि यह केवल एक पिंजरा है निकल कर आख़ेरत में भी जाना है।

लेकिन दूसरी तरफ़ आख़ेरत वाले उन पक्षियों की भाति होते हैं जो बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं जैसे ही वह बाहर निकलते हैं ख़ुशी से उड़ने लगते हैं, वह इस संसार को एक पिंजरे की भाति देखते हैं इसी लिए जब उनकी मौत आती है तो वह ख़ुशी ख़ुशी अपनी जान ईश्वर के हवाले कर देते हैं।

अगरचे मोमिन सदैव इस संसार को पिंजरे की भाति देखते हैं और हमेशा उससे निकलने का प्रयत्न करता रहता लेकिन जब यही मोमिन मर जाता है तो उसके मरने का प्रभाव यह होता है कि इस्लाम में छेद हो जाता है और जिसको कोई भी चीज़ भर नहीं सकती है ऐसा इसलिए है कि ज्ञानी और मोमिन इस्लाम की सीमाओं की सुरक्षा करने वाले हैं और जब वह मरते हैं तो इस्लामी सीमाओं में छेद हो जाता है जिससे शत्रु को इस्लाम में घुसने का मौक़ा मिल जाता है।

हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम धर्मगुरुओं से दूसर हो गए हैं, हम उनकी बात नही सुनना चाहते हैं और चूँकि उनसे दूर हो गए हैं इसलिए शैतान से क़रीब हो गए हैं और उसके रास्ते पर चल पड़े हैं।

ज्ञानी का अमल

قال الکاظم علیه السلام قَلِيلُ الْعَمَلِ مِنَ الْعَالِمِ مَقْبُولٌ مُضَاعَفٌ وَ كَثِيرُ الْعَمَلِ مِنْ أَهْلِ الْهَوَى وَ الْجَهْلِ مَرْدُودٌ

आलिम का कम अमल कई गुना क़ुबूल किया जाता है और इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहने वाले (अहले हवा व हवस) और जाहिलों का अधिक अमल भी स्वीकार्य नहीं है

यह याद रखना चाहिए कि आख़ेरत में इन्सान को उसी इमाम के साथ उठाया जाएगा जो दुनिया में उसका इमाम रहा हो इसका उसने अनुसरण किया हो अगर इस संसार में हम यह कहते रहें कि अली हमारे इमाम हैं लेकिन हमारे कार्य और आमाल शैतानी रास्तों पर हो तो हमको सावधान हो जाना चाहिए, हमारे इमाम अहलेबैत नहीं बल्कि शैतान है, अब अगर आख़ेरत में शैतान के साथ उठाया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि हमने दुनिया में अपने कार्यों से शैतान को ही अपना इमाम बानाया था, इस संसार में जो हमारा चेहरा होगा वही हमारा चेहरा आख़ेरत में होगा अगर इस संसार में हम वास्तविक मोमिन हैं, नमाज़ी हैं, सिलए रहम करने वाले हैं अमानतों को अदा करने वाले हैं तो आख़ेरत में भी हमारा चेहरा मोमिन का होगा लेकिन अगर ईश्वर न करे इस संसार में हम भेड़ियें हो, वासनाओं में लगे रहते तो, केवल दुनिया के चक्कर में रहते हों तो आख़ेरत में भी हमारा चेहर भेड़िये का ही होगा।

स्पष्ट रहे कि इस्लाम ने कहीं पर भी दुनिया से मुंह मोड़ने के लिए नहीं कहा है लेकिन यह अवश्य कहा है कि हमारे जीवन का लक्ष्य दुनिया नहीं होना चाहिए, महत्वपूर्ण यह नहीं है कि तुम्हारा अमल क्या है महत्वपूर्ण यह है कि उस अमल की आत्मा और रूह कैसी हैं, जिसके जीवन की रूह ख़ुदाई हो उसकी दुनिया भी उसके लिए सवाब रखती है लेकिन जिसकी आत्मा शैतानी हो उसकी नमाज़ भी उसके लिए अज़ाब है अगर वह क़ुरआन भी पढ़ता है तो क़ुरआन उस पर लानत करता है।

कंजूस व्यक्ति

قال الکاظم علیه السلام  الْبَخِيلُ مَنْ بَخِلَ بِمَا افْتَرَضَ اللَّهُ عَلَيْهِ

कंजूस वह है कि जो अल्लाह ने उसपर वाजिब किया है उसको अंजाम देने में कंजूसी करे।

आज हमारे समाज में यह बीमारी फैलती जा रही है, हर इन्सान हर चीज़ को केवल अपने लिए चाहता है, वह यह बर्दाश्त नहीं करता है कि अपने माल में से एक पैसा भी अपने किसी भाई या ग़रीब को दे दे, जब्कि ख़ुदा ने ख़ुद गारन्टी ली है कि अगर तुम एक पैसा ख़र्च करोगे तो हम उसका दस गुना तुम को देंगे, लेकिन इन्सान है कि उसको सच्चे ईश्वर पर विश्वास नहीं है, ऐसे व्यक्ति को हम अपनी बोलचाल में कंजूस कहते हैं लेकिन मामूस की निगाह में सबसे बड़ा कंजूस यह नहीं है बल्कि जब मासूम को कंजूस के बारे में बताना होता है तो वह कहते हैं कि कंजूस वह है जो अपने अहकाम पर अमल न करे जो वाजिबात को अंजाम न दे तो हमार चीज़ों से न बचे।

अंत में हर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमको अपने इमामो का सच्चा अनुयायी बना और उनके आदेशा का पालन करने की तौफ़ीक़ दे (आमीन)

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