नहजुल बलाग़ा में ईश्वर का परिचय और फ़रिश्तों के रहने के स्थान का बयान

नहजुल बलाग़ा में ईश्वर का परिचय और फ़रिश्तों के रहने के स्थान का बयान

हर चीज़ उस के सामने आजिज़ (असमर्थ) व सर निगूं (सर झुकाए), और हर शय (वस्तु) उस के सहारे वाबस्ता (संलग्र) है। वह फ़क़ीर का सर्माया (भिक्षुक की पूंजी) हर ज़लील (अपमानित) की आबरु (वैभव), हर कमज़ोर की तवानाई (निर्बल की शक्ति), और हर मज़्लूम (अत्याचार भोगी) की पनाहगाह (शरण स्थल) है। जो कहे, उस की बात भी वह सुनता है, और जो चुप रहे, उस के भेद से भी वह आगाह (अवगत) है। जो ज़िन्दा (जीवित) है उस के रिज़्क़ (जीविका) का ज़िम्मा उस पर है, और जो मर जाए उस का पलटना उस की तरफ़ है। ऐ अल्लाह ! आंखों ने तुझे देखा नहीं कि तेरी ख़बर (सूचना) दे सकें। बल्कि तू तो इस वस्फ़ (प्रशंसा) करने वाली मख़लूक़ (प्राणियों) से पहले मौजूद था। तूने तनहाई की वहशतों से उकता कर मख़लूक़ को पैदा नहीं किया और न अपने किसी फ़ायदे (लाभ) के पेशे नज़र उन से अअमाल (कर्म) कराए। जिसे तू गिरफ़्त में लाना चाहे वह तुझ से आगे बढ़ क नहीं जा सकता। जो तेरी मुख़ालिफ़त (विरोध) करता है, ऐसा नहीं कि वह तेरी इताअत (आज्ञापालन) करता है वह मुल्क की वुसअतों (तेरे राज्य की विशालता) को बढ़ा नहीं देता।

 

और जो तेरी क़ज़ा व क़दर (निर्णय एवं शक्ति) पर बिगड़ उठे, वह तेरे अम्र (आदेश) को रद नहीं कर सकता। और जो तेरे हुक्म (आदेश) से मुह मोड़ ले वह तुझ से बेनियाज़ (बे पर्वाह) नहीं हो सकता। हर छिपी हुई चीज़ तेरे लिये ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) और हर ग़ैब (परोक्ष) तेरे सामने बे नक़ाब है। तू अबदी (अनंतकालीन) है जिस की कोई हद (सीमा) नहीं, और तू ही सब की मंज़िले मुन्तहा (अन्तिम गंतव्य) है जिस से कोई गुरेज़ की राह नहीं। और तू ही वअदागाह है कि तुझ से छुटकारा पाने की कोई जगह नहीं मगर तेरी ही ज़ात। हर राह चलने वाला तेरे क़ब्ज़े में है और हर ज़ी रुह (जीवधारक) की बाज़गश्त (वापसी) तेरी तरफ़ है। सुब्हानल्लाह ! यह तेरी कायनात (जगत) जो हम देख रहे हैं कितनी अज़ीमुश्शान है। और तेरी क़ुदरत (शक्ति) के सामने इस की अज़मत (सहत्ता) कितनी कम है। और यह तेरी बादशाहत (हुकूमत) जो हमारी नज़रों के सामने है कितनी पुर शिकोह (प्रतापी) है। लेकिन तेरी उस सल्तनत (राज्य) के मुक़ाबिले में, जो हमारी निगाहों से ओझल (छिपी) है, कितनी हक़ीर (तुच्छ) है। और दुनिया में यह तेरी नेमतें कितनी कामिल व हमागीर (पूर्ण एवं सर्वव्यापी) हैं मगर आख़िरत (परलोक) की नेमतों के सामने वह कितनी मुख़्तसर (संक्षिप्त) हैं।

[ इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है ]

तूने फ़रिश्तों को आस्मानों में बसाया और उन्हें ज़मीन की सत्ह (पृथ्वी स्तर) से बलन्द रखा। वह सब मख़लूक़ (प्राणियों) से ज़ियादा तेरी मअरिफ़त (परिचय) रखते हैं, और सब से ज़ियादा तुझ से डरते हैं, और सब से ज़ियादा तेरे मुक़र्रब (निकटवर्ती) हैं। न वह सुल्बों (शुक्राणुओं) में ठहरे, न शिकमों (गर्भाशयों) में रखे गए, न ज़लील पानी (तुच्छ जल) अर्थात सीमन (नुत्फ़ा) से उन की पैदाइश हुई, और न ज़माने के हवादिस (कालचक्र) ने उन्हें मुन्तशिर किया। वह तेरे क़ुर्ब (निकट) में अपने मक़ामो मंज़िलत (स्थान एवं श्रेणी) की बलन्दी और तेरे बारे में ख़यालात की एकसूई (विचारों की एकाग्रता) और तेरी इबादत की फ़रावानी (अधिकता) और तेरे अह्काम (आदेशों) में अदमे ग़फ़लत (अशिथिलता) के बावजूद अगर तेरे राज़हाए क़ुदरत की उस तह तक पहुंच जाएं कि जो उन से पोशीदा (गुप्त) है तो वह अपने अअमाल (कर्मों) को बहुत ही हक़ीर (तुच्छ) समझेंगे। और अपने नफ़्सों पर हर्फ़ गीरी (अपनी आत्माओं की आलोचना) करेंगे और यह जान लेंगे कि उन्होंने तेरी इबादत का हक़ अदा नहीं किया और न कमा हक़्क़हू (हक़ भर) तेरी इताअत (आज्ञा पालन) की है। मैं ख़ालिक़ व मअबूद (सृष्टि कर्ता व पूज्य) जानते हुए तेरी तस्बीह (जाप) करता हूं। तेरे उस बह्तरीन सुलूक (सर्वोत्तम व्यवहार) की बिना (आधार) पर जो तेरा अपनी मख़लूक़ात (सृष्टियों) के साथ है। तू ने एक ऐसा घर (स्वर्ग) बनाया है जिस में महमान के लिये खाने पीने की चीज़ें हूरें (अपसरायें) ग़िलमान (दास) महल, नहरें, खेत और फ़ल मुहैया (उपलब्ध) किये हैं। फिर तूने इन नेमतों की तरफ़ दअवत (निमंत्रण) देने वाला भेजा। मगर न उन्होंने बुलाने वाले की आवाज़ पर लब्बेक कही और न उन चीज़ों की तरफ़ राग़िब (रुचिकर) हुए जिन की तरफ़ तू ने रग़बत (रुचि) दिलाई थी।

 

और न उन चीज़ों के मुश्ताक़ (इच्छुक) हुए जिन का तूने इश्तियाक़ दिलाया था. वह तो इसी मुर्दार दुनिया पर टूट पड़े कि जिसे नोच खाने में अपनी इज़्ज़ातों आबरू (मान मर्यादा) गवां रहे थे। और उस की चाहत में एका कर लिया था। जो शख़्स (व्यक्ति) किसी शय (वस्तु) से बेतहाशा (अत्यधिक) महब्बत (प्रेम) करता है, तो वह उस की आंखों को अंधा, दिल को मरीज़ (रोगी) कर देती है। वह देखता है, तो बीमार आंखों से, और सुन्ता है तो न सुनने वाले कानों से। शहवतों (कामेच्छाओं) ने उस की अक़्ल (बुद्धि) का दामन चाक कर दिया है और दुनिया ने उस के दिल को मुर्दा बना दिया है, और उस का नफ़्स (आत्मा) उस पर मर मिटा है। यह दुनिया का और उन लोगों का जिन के पास कुछ भी वह दुनिया है बन्दा व ग़ुलाम बन गया है। जिधर वह मुड़ती है उधर यह मुड़ता है जिधर उस का रुख होता है उधर ही उस का रुख होता है। न अल्लाह की तरफ़ से किसी रोकने वाले से कहने सुन्ने से वह रुकता है, और न ही उस के किसी वअज़ व पन्द (प्रवचन एवं उपदेश) करने वाले की नसीहत (सदुपदेश) मानता है। हालांकि वह उन लोगों को देखता है कि जिन्हें ऐन ग़फ़लत की हालत में (ठीक अचेतावस्था में) वहां पर जकड़ लिया गया कि जहां न तदारुक (नुवारण) की गुन्जाइश औऱ न दुनिया की तरफ़ पलटने का मौक़ा होता है। और किस तरह वह चीज़ें उन पर टूट पड़ीं कि जिन से वह बेख़बर (अनभिज्ञ) थे। और किस तरह इस दुनिया से जुदाई की घड़ी सामने आ गई कि जिस से पूरी तरह मुत्मइन (निश्चिन्त) थे। और किस तरह आख़िरत (परलोक) की उन चीज़ों तक पहुंच गए कि जिन्की उन्हें ख़बर दी गई थी अब जो मुसीबतें (आपत्तियां) उन पर टूट पड़ी हैं उन्हें बयान नहीं किया जा सकता। मौत की सख़्तियां और दुनिया छोड़ने की हसरतें मिल कर उन्हें घैर लेती हैं। चुनांचे उन के हाथ पेर ठीले पड़ जाते हैं और रंगतें बदल जाती हैं। फरि उन के अअज़ा (अंगों) में मौत की दख़्ल अंदाज़िया (हस्तक्षेप) बढ़ जाती हैं।

 

कोई ऐसा होता है कि पहले ही उस की ज़बान बन्द हो जाती है, इस सूरत (स्थिति) में कि उस की अक़्ल (बुद्धि) दुरुस्त और होशो हवास (चेतना एवं ज्ञानेन्द्रियां) बाक़ी होते हैं। वह अपने घर वालों के सामने पड़ा हुआ अपनी आंख़ों से देखता है, और अपने कानों से सुन्ता है, और उन चीज़ों को सोचता है, कि जिन में उस ने अपनी उम्र (आयु) गवां दी है, और अपना ज़माना (समय) गुज़ार दिया है, और अपने जमा किये हुए मालो मताअ (धन व धरोहर) को याद करता है, कि जिस के तलब करने में (प्राप्त करने में) जायज़ व नाजायज़ (वैध व अवैध) से आंखें बन्द कर ली थीं, और जिसे साफ़ व मशक़ूक़ (स्पष्ट एवं सन्देह जनक) हर तरह की जगहों से हासिल किया था। उस का वाबाल (आपत्ति) अपने सर लेकर उसे छोड़ देने की तैयारी करने लगा। वह माल अब उस के पिछलों के लिये रह जायेगा कि वह उस से ऐशो आराम करें और गुलछर्रे उड़ायें। इस तरह वह दूसरों को तो बग़ैर हाथ पैर हिलाए यूंही मिल गया लेकिन इल का बोझ उस की पीठ पर रहा। और यह उस माल की वजह से ऐसा गिर्वी (बंधक) है कि बस अपने को छु़ड़ा नहीं सकता। मरने के वक्त यह हक़ीक़त (यथार्थ) जो खुल कर उस के सामने आ गई तो निदामत (लज्जा) से वह अपने हाथ काटने लगता है और उम्र भर जिन चीज़ों का तलबगार रहा था अब उन से किनारा ढ़ूडता है, और यह तमन्ना (आकांछा) करता है कि जो उस माल की वजह से उस पर रश्को हसद (ईर्ष्या) किया करते थे। काश कि वही इस माल को समेटते, न वह अब मौत के तसर्रुफ़ात उस के जिस्म में और बढ़े यहां तक कि ज़बान के साथ साथ कानों पर भी मौत छा गई।

घर वालों के सामने उस की यह हालत होती है कि न ज़बान से बोल सकता है न कानों से सुन सकता है। आखें धुमा धुमा कर उन के चहरों को तकता है। उन की ज़बानों की जुंबिशों को देखता है लोकिन बात चीत की अवाज़ें नहीं सुन पाता। फिर उस से मौत और लिपट गई कि उस की आंखों को भी बन्द कर दिया, जिस तरह उस के कानों को बन्द किया था और रुह (आत्मा) उस के जिस्म से मुफ़ारेक़त कर गई (पृथक हो गई) अब वह घर वालों के सामने एक मुर्दार की सूरत में पड़ा हुआ है कि उस की तरफ़ से उन्हें वहशत (उलझन) होती है और उस के आस पास फ़टकने से दूर भागते हैं। न वह रोने वाले की कुछ मदद कर सकता है, न पुकारने वाले को जवाब दे सकता है। फिर उसे उठा कर ज़मीन में जहां उस की क़ब्र बनना है ले जाते हैं और उसे उस के हवाले कर देते हैं कि अब वह जाने और उस का काम। और उस की मुलाक़ात से हमेशा के लिये मुह मौड़ लेते हैं। यहां तक कि नबिश्ताए तक़दीर (भाग्य का लिखा) अपनी मीआद (अवधि) को और हुक्मे इलाही (अल्लाह का आदेश) अपनी मुक़र्ररा हद (निश्चित सीमा) को पहुंच जायेगा, और पिछलों को अगलों के साथ मिला दिया जायेगा और फरमाने क़ज़ा फिर सिरे से पैदा करने का इरादा लेकर आयेगा तो आसमानों को जुंबिश में लायेगा, और उन्हें फ़ाड़ देगा। और ज़मीन को हिला डालेगा और उस की बुनियादें ख़ोखली कर देगा और पहाड़ों की जड़ बुनियाद से उख़ाड़ देगा। और वह उस के जलाल (वैभव) की हेबत (भय) और क़हरो ग़लबा (क्रोध एवं आधिपत्य) की देहशत से आपस में टकराने लगेंगे वह ज़मीन के अन्दर से सब को निकालेगा और उन्हें सड़गल जाने के बाद फिर अज़ सरे नो (नए सिरे से) तरो ताज़ करेगा और मुतफ़र्रिक़ और परागन्दा होने के बाद फरि एकजा (एकत्र) कर देगा।

 

फिर उन के छिपे हुए अअमाल (गुप्त कार्यो) और पोशीदा कार गुज़ारियों के मुतअल्लिक़ पूछ गछ करने के लिये उन्हें जुदा जुदा करेगा और उन्हें दौ हिस्सों में बाट देगा। एक को वह इन्आम व इकराम (पुरस्कार एवं सम्मान) देगा और एक से इन्तेक़ाम (बदला) लेगा। जो फरमां बर्दार (आज्ञा कारी) थे उन्हें जज़ा (पुण्य) देगा कि वह उस के जवारे रेहमत (कृपा छेत्र) में रहें, और उन्हें अपने घर में हमेशा (सदैव) के लिये ठहरा देगा, कि जहां उतरने वाले फिर कूच (प्रस्थान) नहीं किया करते और न उन के हालात अदलते बदलते रहते हैं। और न उन्हें घड़ी घड़ी खौफ़ (भय) सताता है, न बीमारियां उन पर आती हैं और न उन्हें खतरात दरपेश होते हैं और न उन्हें सफ़र एक जगह से दूसरी जगह लिये फिरते हैं। और जो न फर्मान (अवज्ञाकारी) उन्हें एक बुरे घर में फेंकेगा और उन के हाथ गर्दन से कस कर बान्ध देगा और उनकी पैशानियों पर लटकने वाले बालों को क़दमों सो जकड़ देगा। और उन्हें तारकोल की कमीसें और आग से क़त्अ किये हुए कपड़े पहनायेगा। अर्थाथ उन पर तैल छिड़क कर आग में झोंक देगा। वह ऐसे अज़ाब (दण्ड) में होंगे कि जिस की तपिश बड़ी सख़्त होगी और ऐसी जगह में होंगे कि जहां उन पर दरवाज़ें बन्द कर दिये जायेंगे। और ऐसी आग में होंगे कि जिस में तेज़ शरारे, भड़कने की आवाज़ें (उटती हुई लपटें) और हौलनाक चीख़ें होंगी। इस में ठहरने वाला निकल न सकेगा। और न ही उस के क़ेदियों को फिदया (उस के बदले दूसरा) देकर छुड़ाया जा सकता है, और न ही उन की बैड़ियां टूट सकती हैं। इस घर की कोई मुद्दत मुक़र्रर नहीं कि उस के बाद मिट मिटा जाए। न रहने वालों के लिये कोई मुक़र्ररा मीआद (निर्धारित अवधि) है कि वह पूरी हो जाए तो फिर छोड़ दिये जायें।

[ इसी ख़ुत्बे का यह जुज़ (अंश) नबी (स.) के मुतअल्लिक़ है ]

उन्होंने इस दुनिया को ज़लीलो ख़्वार समझा और पस्तो हक़ीर जाना और जानते थे कि अल्लाह ने उन की शान को बालातर समझते हुए दुनिया का रुख उन से मोड़ा है, और धटिया समझते हुए दूसरों के लिये उस का दामन फ़ैला दिया है। लिहाज़ा आप ने दुनिया से दिल हटा लिया और उस की याद अपने नफ़्स (आत्मा) से मिटा डाली, और यह चाहते रहे कि उस की सज धज उन की नज़रों से ओझल रहे कि न उस से उम्दा उम्दा लिबास हासिल करें और न उस में क़ियाम की आस लगायें। उन्होंने उज़्र तमाम करते हुए अपने पर्वरदिगार का पैग़ाम पोहचा दिया और डराते हुए उम्मत को पन्दो नसीहत की और ख़ुश्ख़बरी सुनाते हुए जन्नत (स्वर्ग) की तरफ़ दअवत दी। हम नुबुवत का शजरा (वंशावली) रिसालत की मंज़िल मलायका की फ़रोदगाह, इल्म का मअदिन, और हिकमत का सरचश्मा हैं हमारी नुसरत करने वाला और हम से महब्बत करने वाला रहमत के लिये चश्म बराह है, और हम से दुश्मनी व इनाद रखने वाले को क़हरे इलाही का मुन्तज़िर रहना चाहिये।

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नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा -107

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