ईश्वर से सबसे दूर व्यक्ति

ईश्वर से सबसे दूर व्यक्ति

“जिस समय पेट बहुत अधिक भरा हो उस समय मनुष्य की ईश्वर से दूरी सब से अधिक होती है। (पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम)

अब आप स्वयं ही देख लें, इस स्थिति में मनुष्य न कुछ सीखना चाहता है, न पढ़ना चाहता है, न कुछ सोचना चाहता है, न कुछ करना चाहता है। ऐसा व्यक्ति बस आंखें बंद करके सोना चाहता है। यह व्यक्ति अपने आप पर तो अत्याचार तो करता ही है दूसरों के लिये भी निकम्मा और निठल्ला बन कर किसी भी तरह सहायक नहीं होता। ऐसे व्यक्ति को ईश्वर की भी कोई परवाह नहीं होती और स्पष्ट है कि वह परमात्मा से दूर बहुत दूर हो जाता है।

उस पौधे का क्या कहना जो पानी के मार्ग में उगा हुआ हो। वह तेज़ी से बढ़ता है, हरा भरा रहता है, फूल फल देता है और अपनी सुंदरता से सब को मोह लेता है। उसके निकट बैठें तो मन आनन्दित हो उठेगा। परन्तु कितना दुर्भाग्यशाली है वह पौधा जो पानी से दूर उगता है, बड़ी जल्दी मुरझा जाता है, सूख जाता है और टूट फूट कर हवा के झोकों के साथ बिखर जाता है। मनुष्य वही पौधा है और ईश्वर वही पानी, वही अमृत। उसकी महानता का क्या कहना है जो ईश्वर के मार्ग में हो, उसके निकट हो। वह देखने योग्य होता है, उसका चरित्र, ज्ञान और प्रकाशमयी अस्तित्व सभी को आनन्द प्रदान करता है। ईश्वर के मार्ग में आने के लिए मनुष्य को ईश्वर का दास बनना पड़ता है, बिना किसी गर्व व घमंड के आज्ञा पालन करना होता है। तो फिर यदि दास बनना हैतो बहाने न बनाओ, यह न कहो कि जब समझ जायेंगे तभी काम करेंगे। हराम की कमाई और वर्जित चीज़ें खाने पीने से हाथ उस समय तक नहीं रोकेंगे जब तक कारण न पता चल जाये। देखिये, सांसारिक जीवन और आध्यात्म का क्षेत्र एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न है, बिल्कुल अलग। सांसारिक जीवन में प्रथम ज्ञान है उसके पश्चात कर्म जैसे पहले भौतिकी पढ़ें फिर चांद पर जायें परंतु आध्यात्म में इसका उलटा है अर्थात पहले कर्म है फिर ज्ञान प्राप्त होगा। पहले ईश्वर के आदेश को मानो फिर उसकी पहचान कर पाओगे और ज्ञान प्राप्त होगा। बंदिगी का अर्थ होता है कि कर्म करो ताकि विश्वास, पहचान तथा ज्ञान तक पहुंच सको बल्कि यह सब स्वयं ही तुम्हारे पास आएंगे।

और अब अपने भाइयों और बहनों से हम यह पूछना चाहेंगे कि आपकी दृष्टि में कौन से लोग महान होते हैं, कौन से लोग मानवता की कसौटी पर पूरे उतरते हैं? शायद आपका उत्तर यह हो कि जो महान कार्य करते हैं, सच्चे, निडर भले होते हैं आदि-2। तो फिर यह बताइये कि जो आदमी अपनी और परिवार की ख़राब परिस्थतियों के कारण पढ़ाई नहीं कर सका या जिसके समक्ष कोई बड़ा कार्य रखा ही नहीं गया तो क्या वह महान बनने का अधिकार नहीं रखता?

आइये थोड़े से शब्दों में हम बतायें कि मानवता की कसौटी पर पूरा उतरने या महान और परिपूर्ण मनुष्य बनने के लिये क्या करना होता है। जो आदमी जिस सीमा तक ज़िम्मेदारी स्वीकार करता है और जितनी बड़ी ज़िम्मेदारी स्वीकार करता है वह उतना महान कहलाता है। अब आप इस परिभाषा पर विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्ध लोगों को देखते जायें तो आपको पता चलता जायेगा कि जिसने जितनी बड़ी ज़िम्मेदारी स्वीकार की अर्थात दायित्व बोध किया वह उतना ही महान बना है।

आइए इसका उदाहरण भी देखते जाइयेः ईरान में एक किसान है, अभी जीवित है, बूढ़ा है, उसका नाम है रीज़ अली ख़ाजवी। यह किसान जब तीस- बत्तीस वर्ष का एक साधारण सा व्यक्ति था उस समय जाड़े की एक ठंडी रात में अपने घर की ओर जाते हुये मार्ग में पड़ने वाली रेलवे लाइन से गुज़रा। उसने देखा कि रेलवे लाइन जिसके दोनों ओर पहाड़ थे उस पर भूस्खलन के कारण बड़े -2 पत्थर गिर गये हैं और रेलवे लाइन टूट फूट गयी है। उसने सोचा कि इस समय जो रेलगाड़ी इस पर से जाने वाली है उसे किसी भी तरह से रोकना है, अतः उसने वहां रूक कर अपनी शिकारी बंदूक़ से ट्रेन को रोकने के लिये कई फ़ाएर किये किंतु दूर से आती हुयी रेल गाड़ी पर उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ ते उसने अपने सिर पर जो कपड़ा  लपेट रखा था उसे अपनी लालटेन में मौजूद मिट्टी के तेल से भिगो कर जलाया और पटरी पर दौड़ना आरम्भ कर दिया। जलते हुये कपड़े से निकलते शोले देख कर ड्राइवर ने रेलगाड़ी की गति कम कर दी और दुर्घटना से पूर्व ही रेलगाड़ी रूक गयी और इस प्रकार एक साधारण व्यक्ति एक ट्रेन को दुर्घटना से बचा कर महान और सदैव याद रखने योग्य बन गया। इस प्रकार दायित्व बोध सभी को महान बना सकता है।

वरिष्ठ नेता सय्यद अली खामेनेई का कथन है कि दायित्व बोध का अर्थ है कि जिस काम की ज़िम्मेदारी हमने स्वीकार की है उसे पूर्ण रूप से और बहुत अच्छी तरह करें।

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