ज़ाकिर नाईक मामला, आतंकवाद पर नकेल या मात्र राजनीतिक हथकंडा
ज़ाकिर नाईक मामला, आतंकवाद पर नकेल या मात्र राजनीतिक हथकंडा
बुशरा अलवी
पिछले कुछ दिनों से हिन्दुस्तानी मीडिया में लगातार एक चेहरे को दिखाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि यही है सबसे बड़ा आतंकवादी, यहीं है आतंकवादियों को आतंकवाद का रास्ता दिखाने वाला, यही है वह शख़्स जो भोले भाले जवानों को मौत और खून का खेल खेलना सिखाता है, यही है वह व्यक्ति जो....
आज जिधर भी देखें ज़ाकिर नाईक के बारे में ही बात हो रही है और हर कोई उसको देश और समाज के लिये ख़तरा बताने पर तुला हुआ है, लेकिन प्रश्न यह है कि वह भारतीय मीडिया जो हर मुसलमान को शक की निगाह से देखने की आदी रही है और जिसकी नज़र में हर भारतीय मुसलमान आतंकवादी रहा है उसकी नज़रों से ज़ाकिर नाईक जैसा व्यक्ति अब तक कैसे बचा रहा, और कैसे अब तक हिंदुत्व विचारधारा से प्रभावित भारतीय मीडिया उसको मात्र एक इस्लामिक स्कालर या धर्मप्रचारक के तौर पर देखता रहा और हद तो यह है कि बंग्लादेश धमाके से पहले तक कभी किसी सरकार ने भी उनके विरुद्ध कोई क़दम नहीं उठाया, क्या यह सरकारें नाईक को नहीं जानती थीं? उसके द्वारा चालाए जाने वाले पीस टीवी चैनल के बारे में उनको नहीं पता था? या जानते बूझते सरकारें अनदेखा करती रहीं। और अब अचानक जाकिर नाम का जिन निकल कर पूरे हिन्दुस्तान पर छा गया, कही ऐसा तो नहीं कि इसके पीछे भी कोई राजनीतिक कारण हो, जब देख रहे हैं कि पिछले कुछ दिनों से भारत की मोदी सरकार पर विपक्ष के साथ साथ आम जनता भी लगातार हमले बोल रही है कभी 45000 करोड़ के घोटाले की बात आती है तो कभी जनता प्रेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस जैसी चीज़ों की बढ़ती क़ीमतों से अपने बिगड़ते बजट के कारण रो रही है, और कभी टमाटर, दाल.... आदि जैसी मूलभूत चीज़ों की मंहगाई के नीचे दब कर त्राहि त्राहि कर रही है, कहीं नाईक का यह मामला जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश तो नहीं है?
क्योंकि सभी जानते हैं कि ज़ाकिर नाईक जो ख़ुद को इस्लाम का प्रचारक बताते हैं. लेकिन वो जिस सलफी या वहाबी इस्लाम का प्रचार करते हैं, उसे अपने कट्टरपंथी तेवर के कारण दुनिया भर में आतंकवाद से जोड़कर देखा जाता है. ज़ाकिर नाईक को सलफी इस्लाम का भारतीय चेहरा भी कहा जाता है।
वही वहाबी विचारधारा जो इब्ने तैमिया से आरम्भ होती है और अब्दुल वह्हाब और सऊदी अरब के शाही ख़ानदान के माध्यम और तेल की अकूत सम्पत्ती के ज़रिये पूरे विश्व में फैलाई जाती है, वह वहाबी विचारधारा जिसने आज न केवल इस्लामी दुनिया बल्कि पूरे विश्व में ख़ून का बाज़ार गर्म कर रखा है, वह वहाबी पंथ जो अपने अतिरिक्त गैर मुसलमान तो दूर की बात है दूसरे मुसलमानों तक को काफिर मानता है, वह वहाबियत जो यह कहती है कि पैग़म्बर के रौज़े को गिरा देना चाहिये, अल्लाह के घर काबे को हम गिरा देंगे क्योंकि वहाँ एक पत्थर की पूजा की जा रही है.....
जाकिर नाईक भारतीय समाज के लिये कोई नया नाम नहीं है यही वह व्यक्ति है जिसने पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने छोटे नवासे इमाम हुसैन को शहीद करने वाले, मदीने पर हमला करने वाले, अल्लाह के घर काबे का अपमान करने वाले, पैग़म्बर से महान सहाबियों के हत्यारे यज़ीद को अमरीरुल मोमिनीन कहता है
वह ज़ाकिर नाईज अलक़ायदा और ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को आतंकवादी न कहकर इस्लाम का रक्षक बताया और उसके समर्थन का ऐलान किया। और इससे बड़ा और गंभीर बयान क्या हो सकता है कि उसने हर मुसलमान को आतंकवादी बनने की राह दिखाई और कहा कि हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिये।
कह यह सब भारतीय मीडिया और सरकार से छिपा हुआ था? नहीं जब हर तरफ़ से मुसलमान और इस्लामी ओलेमा ज़ाकिर नाईक पर प्रतिबंध लगाने उसकी स्पीच को रोकने उसके चैनल को बंद करने के बारे में कह रहे थे तब कभी भी सरकार के कानों पर जूँ नहीं रेंगी, यह सभी जानते हैं कि वहाबी विचारधारा रखने वाला ज़ाकिर नाईक भारत की अखंडता के लिये बहुत बड़ा ख़तरा है वह मुसलमानों को बहका रहा है और अगर उस पर लगाम नहीं लगाई गई तो वह एक दिन हिन्दुस्तान में आशांति का माहौल पैदा कर देगा, क्योंकि इतिहास गवाह रहा है कि जहां जहां पर वहाबी विचारधारा का प्रसार हुआ है वहाँ पर खून की नदियां बही हैं
डॉक्टर जाकिर नाईक ने भले ही अपने चैनल का नाम ‘पीस टीवी’ रखा हो, लेकिन इस चैनल के जरिये वो अमन का नहीं बल्कि फसाद का पैगाम देते हैं, जहर उगलते हैं. न केवल दूसरे धर्मों के खिलाफ बल्कि मुसलिमों के दूसरे संप्रदायों के खिलाफ भी।
तो जितनी जल्दी हो सके इस प्रकार की विचारधारा रखने वाले लोगों पर नकेल कसी जानी चाहिये, लेकिन भारत के हालिया राजनीतिक माहौल के देखते हुए कहा जा सकता है नाईक का यह मामला देश की सुरक्षा से कहीं आधिक राजनीतिक कारण से जुड़ा हुआ है।
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