रमज़ान और इंसान 4

रमज़ान और इंसान 4

महान व कृपालु ईश्वर ने इस पवित्र महीने में समस्त इंसानों के लिए अपनी असीम कृपा का द्वार खोल दिया है। हर इंसान अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार इस पवित्र महीने की बरकतों से लाभ उठाता है।

यद्यपि रोज़े में इंसान विदित रूप से खाता -पीता नहीं है परंतु रोज़े से सही अर्थों में लाभ उठाने के लिए रोज़ेदार को चाहिये कि उसके शरीर के समस्त अंग भी रोज़ा रखें। दूसरे शब्दों में रोज़ेदार को चाहिये कि वह अपनी ज़बान से कोई पाप अंजाम न दे किसी की बुराई न करे अपने हाथों से कोई ग़लत कार्य अंजाम न दे और आंखों से हराम चीज़ न देखे। कोनों से किसी की बुराई न सुने। संक्षेप में यह कि रोज़ेदार को चाहिये कि वह अपने शरीर के अंगों को भी हर प्रकार के पाप से बचाये।

हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” हे रोज़ादार ईश्वर तुझ पर कृपा करे बेशक रोज़ा एक पर्दा है जिसे ईश्वर ने कानों, ज़बानों, आंखों और शरीर के दूसरे अंगों पर क़रार दिया है। सच में ईश्वर ने रोज़ेदार के समस्त अंगों के लिए अधिकार निर्धारित कर दिये हैं तो जो भी रोज़े की हालत में अपने शरीर के अंगों के अधिकारों को अदा करे बेशक वह रोज़ेदार है और उसने अपने रोज़े के अधिकार को अदा किया है और जो लोग जिस सीमा तक इन अधिकारों की अनदेखी करेंगे उसी सीमा तक उनके रोज़ों का पुण्य कम हो जायेगा।“
जो वास्तविक रोज़ेदार होता है वह अपनी ज़बान को झूठ बोलने, दूसरे की बुराई करने, दुसरों को बुरा -भला कहने और दूसरों पर आरोप लगाने से रोक कर रखता है। इसी तरह वह अपने कानों को बुरी चीज़ों को सुनने से रोके रखता है। वास्तविक रोज़ेदार अपनी आंखों को हर चीज़ देखने की अनुमति नहीं देता है। समाज में बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें देखने से इंसान के अंदर पाप करने की भावना उत्पन्न होती है यानी वे चीज़ें इंसान को पाप करने के लिए उकसाती हैं तो वास्तविक रोज़ेदार को चाहिये कि जो दृश्य उसे पाप करने के लिए उकसायें उन्हें देखने से परहेज़ करे।

जो इंसान रोज़े से हो उसे ईर्ष्या, द्वेष, और शत्रुता जैसे पापों एवं अनैतिक कार्यों से दूर रहना चाहिये। क्योंकि रोज़ा वास्तव में ईश्वरीय भय व सदाचारिता तक पहुंचने का अभ्यास है। सुबह की अज़ान से शाम तक की अज़ान तक का समय बुरे कार्यों से स्वयं को नियंत्रित करने का बेहतरीन अवसर है और रोज़ा खोलने के समय तक जो रोज़ेदार बुरे कार्यों से दूर रहेगा निश्चित रूप से वह अधिक पुण्य प्राप्त करेगा। इस आधार पर बुरे व ग़लत कार्यो से से बचने में रोज़दार जितना सफल होगा वह उपासना के कार्यों में उतना ही सफल होगा। अगर रोज़ेदार उन विभिन्न पापों को अंजाम दे जिनसे रोज़ा नहीं टूटता है फिर भी रोज़ा रखने का उसका पुण्य कम हो जायेगा।

जो महान ईश्वर का सच्चा बंदा होता है वह इस बात का प्रयास करता है कि उसके समस्त कार्यों में किसी प्रकार का कोई दोष न हो। क्योंकि शुद्ध व पूर्ण निष्ठा के साथ अंजाम दिया गया कार्य ही महान ईश्वर की बारगाह में स्वीकार किया जाता है और उससे महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की प्रसन्नता का मार्ग प्रशस्त होता है।

रोज़े का एक लाभ यह है वह इंसान के अंदर पापों से दूर रहने की क्षमता उत्पन्न करता है। जो लोग अपने आपको पापों से नहीं रोक पाते हैं रमज़ान का पवित्र महीना एसे लोगों के लिए बेहतरीन अवसर है।

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम इस संबंध में फरमाते हैं” रोज़ा, रोज़ेदार के लिए दुनिया की मुसीबतों से रुकावट है और नरक की आग से बचने का रक्षा कवच है तो तुम जब रोज़ा रखना चाहो अपने आपको हर प्रकार की बुराई से रोको क्योंकि रोज़े की हालत में पाप अंजाम देना रोज़े के पुण्य के कम होने और स्वीकार होने से वंचितता का कारण बनता है।“

दूसरों की बुराई करने, झूठ बोलने, पराई महिला या लड़की को ग़लत दृष्टि से देखने और दूसरों पर अत्याचार करने से रोज़ा ख़राब नहीं होता है परंतु रोज़ेदार रोज़े के वास्तविक एवं आध्यात्मिक लाभों को नहीं प्राप्त कर पाता है और ये चीज़ें परिपूर्णता के मार्ग की बाधायें बन जाती हैं। इतिहास में आया है कि एक बार एक महिला ने ग़ैर अनिवार्य रोज़ा रखा था और वह अपनी पड़ोसन को बुरा- भला कहती थी। पैग़म्बरे इस्लाम ने रोज़ेदार महिला के समक्ष खाना हाज़िर कर दिया और उससे कहा कि इसे खाओ। उस रोज़ेदार महिला ने पैग़म्बरे इस्लाम से कहा मैं रोज़े से हूं इस पर पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया तुम किस प्रकार रोज़ा रखने का दावा कर रही हो जबकि तुम अपनी पड़ोसन को बुरा- भला कर रही हो? जान लो कि रोज़ा केवल यह नहीं है कि कोई खाना- पीना छोड़ दे बल्कि रोज़ेदार को चाहिये कि वह अपने शरीर के अंगों से भी रोज़ा रखे और बुरे कार्यों व कथनों से दूरी करे। ईश्वर ने बुरे कर्मों और कथनों से बचाने के लिए रोज़े को कवच बनाया है। इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने दूसरों को संबोधित किया और फरमाया रोज़ा रखने वाले कितने कम और भूखा रहने वाले कितने अधिक हैं।“

बुरे कार्यों के जाल में फंस जाना महान ईश्वर की कृपा से दूरी का महत्वपूर्ण कारण है। धार्मिक शिक्षाओं में अंतरात्मा को बुरे कार्यों से रोकने और मन की इच्छाओं को संतुलित करने के बहुत से मार्ग बताये गये हैं जिनमें से एक रोज़ा है। क्योंकि रोज़ा एक प्रकार का अभ्यास है कि अगर नियमबद्ध तरीक़े से उसकी पुनरावृत्ति हो तो धीरे धीरे वह इंसान के अंदर पापों से दूरी की शक्ति को मज़बूत करेगी और वही भावना इंसान के मन पर हावी हो जायेगी। इस प्रकार हर पाप के मुकाबले में रोज़ेदार का नियंत्रण समाप्त नहीं होता है बल्कि वह रोज़े के परिणाम में पापों से दूरी करता है और उसके अंदर पाप करने की क्षमता मौजूद रहती है परंतु वह पाप नहीं करता है। पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं जो रमज़ान के महीने में रोज़ा हो और आंतरिक इच्छाओं तथा अपनी ज़बान को पापों से एवं स्वंय को लोगों को कष्ट पहुंचाने से रोके तो ईश्वर उसके पापों को क्षमा कर देगा और उसे नरक से मुक्त कर देगा और उसे स्वर्ग में स्थान देगा।“

रमज़ान का पवित्र महीना आरंभ होने के साथ ही बहुत से लोगों के दिमाग़ में यह प्रश्न आता है कि  जो व्यक्ति रोज़ा रखता है क्या वह खाना- पीना छोड़कर दिनचर्या के अपने कार्यों को अंजाम दे सकता है? क्या रमज़ान का पवित्र महीना सांसारिक मामलों में इंसान की प्रगति के मार्ग में बाधा नहीं है? रोज़ा रखने वाले लोगों के जीवन पर दृष्टि डालने से हम यह बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि यद्यपि यह महीना कठिनाइयों भरा होता है परंतु रोज़ा रखने वाले ने न केवल अपने काम नहीं किया बल्कि अधिक प्रयास व निष्ठा के साथ अपने कार्यों को जारी रखे हुए हैं। रोज़ा रखने वाले धैर्य व तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय का अभ्यास कर रहे हैं।

FREDERIC KANOUTE विश्व के एक प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी हैं और उन्होंने ईश्वरीय धर्म इस्लाम को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने इस्लाम धर्म का अध्ययन करके वास्तविकता को समझ लिया और मुसलमान हो गये। वह उन मुसलमानों में से हैं जो न केवल रमज़ान के पवित्र महीने को किसी प्रकार की रुकावट नहीं समझते हैं बल्कि वह इस महीने में अधिक प्रयास करते हैं।

कई वर्षों से रमज़ान का पवित्र महीना और युरोप में फुटबाल खेलने का समय एक साथ पड़ रहा है। इस मामले को स्पेन के फुटबाल में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है और स्पेन की फुटबाल की टीम में मुसलमान खिलाड़ियों को दूसरों से अधिक इस समस्या का सामना है। प्रशिक्षकों का मानना है कि जो मुसलमान सूरज निकलने से लेकर सूरज डूबने तक कुछ नहीं खाते -पीते हैं वे फ़िटनेस स्तर से दूर हो जाते हैं और उन्हें चाहिये कि वे बेंचों पर बैठक कर मैचों को देखें। मुसलमान खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के मध्य यह चुनौती व समस्या जारी है परंतु मुसलमान खिलाड़ी रोज़ा रखने से प्रायः पीछे नहीं हट रहे हैं बल्कि पहले वर्ष की तुलना में अधिक दृढ़ता से रोज़ा रखते हैं और वे दर्शा रहे हैं कि रोज़ा उनके प्रयास व खेल के मार्ग में बाधा नहीं है।

रमज़ान का पवित्र महीना आरंभ होने के साथ ही FREDERIC KANOUTE रोज़ा रखना आरंभ कर देते हैं। वे प्रतिदिन रोज़ा रखते हैं अलबत्ता प्रतिवर्ष उन्हें टीम के खाद्य विशेषज्ञों से समस्या होती है। स्पेन में फुटबाल की टीम में रमज़ान के संबंध में मौजूद समस्या जानी- पहचानी है परंतु कुछ दूसरी टीमों में ऐसे व्यक्ति हैं जो रोज़ा रखने वाले खिलाड़ियों के लिए समस्याएं खड़ी करते हैं। FREDERIC KANOUTE वह फुटबाल खिलाड़ी हैं जिन्होंने रमज़ान महीने के अपने एक खेल के दौरान दो गोल मारा और खेल के बाद कहा मैंने दो गोल मारा ताकि टीम के खाद्य विशेषज्ञ हमारा पीछा छोड़ दें और यह जान लें कि रोज़ा रखने से मेरे लिए कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है बल्कि मैदान में हमारी गतिविधियों में और वृद्धि हो जाती है। रोज़ा रखने से धैर्य व प्रतिरोध की शक्ति मज़बूत होती है और रोज़ा ईश्वर के आदेश पालन से दिल को मज़बूत करता है।“

FREDERIC KANOUTE ईश्वरीय धर्म इस्लाम के स्वीकार करने से शांति का आभास करते हैं और व्यायाम ने उनके अंदर सोचने- समझने और एकाग्रता का बेहतरीन अवसर उत्पन्न कर दिया है। वह कहते हैं मुझे जब भी खाली समय मिलता है मैं एकांत में ईश्वर की उपासना करता हूं कभी हमारी टीम के दूसरे खिलाड़ी हमें देखते भी हैं परंतु वे जानते हैं कि मैं मुसलमान हो गया हूं और वे मेरे विचारों का सम्मान करते हैं। अधिकांश मेरी उपासना और मेरे कार्यों के बारे में जिज्ञासु हैं विशेषकर रमज़ान महीने में। वे आश्चर्य करते हैं कि मैं क्यों कोई चीज़ नहीं खाता-पीता और वे इस संबंध में बहुत अधिक प्रश्न करते हैं। इन सब के बावजूद कभी भी मुझे कष्ट नहीं पहुंचाया गया और मैं अपनी उपासना से आनंदित होता हूं।“

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