इमाम मोहम्मद तक़ी (अ) के जन्मदिवस के अवसर पर विशेष

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ) के जन्मदिवस के अवसर पर विशेष

आज रजब की १० तारीख़ है। आज ही के दिन 195 हिजरी क़मरी में हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के सुपुत्र और भलाई व दान की प्रतिमूर्ति इमाम जवाद अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ था। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे ने इस्लाम की परंम्परा के अनुसार इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में इक़ामत कही। जिस दिन इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम पैदा हुए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम पूरी रात उनके पालने के पास रहे और उनसे बात करते रहे और उन्हें ईश्वरीय ज्ञानों व रहस्यों की शिक्षा देते रहे और इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपने नवजात शिशु का नाम मोहम्मद रखा।

पवित्र कुरआन और इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार इमाम विशेष स्थान का स्वामी होता है। इमाम ज़मीन पर महान ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। वह हर प्रकार के पाप से पवित्र और पूरिपूर्ण मनुष्य होता है और वह महान ईश्वर की ओर से लोगों का मार्गदर्शन करता है और जो भी उसकी शिक्षाओं पर अमल करता है इमाम उसे उसके योग्य स्थान पर पहुंचा देता है। दूसरे शब्दों में आसमान और ज़मीन तथा इन दोनों के बीच में जो कुछ भी है अगर वह इमाम के आदेशों का पालन करता है और उसकी शिक्षाओं पर अमल करता है तो इमाम उसे उस स्थान पर पहुंचा देता है जिसका वह पात्र होता है क्योंकि इमाम पैग़म्बरों की तरह महान ईश्वर की ओर से लोगों का मार्गदर्शन करता है। वास्तव में इमाम वह परिपूर्ण हस्ती होता है जो लोक- परलोक और धार्मिक एवं ग़ैर धार्मिक मामलों का ज़िम्मेदार होता है। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम भी उन्हीं इमामों में से एक हैं। आप भी अपने पूर्वजों की भांति समस्त चीज़ों में परिपूर्णता के शिखर पर थे परंतु दान के संबंध में उनका विशेष स्थान था। कोई भी इमाम के पास से खाली हाथ वापस नहीं जाता था इसी कारण इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम को जवाद की उपाधि दी गयी।

इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की एक विशेषता यह थी कि वे बचपने में ही अत्यधिक ज्ञान के स्वामी हो गये थे। पवित्र कुरआन के प्रसिद्ध व्याख्याकर्ता तबरी लिखते हैं” जब इमाम जवाद अलैहिस्सलाम 6 वर्ष और कुछ महीने के थे तो उनके पिता को शहीद कर दिया गया और शीया बहुत परेशान थे कि अब क्या होगा लोगों में मतभेद हो गया। क्योंकि वे इमाम को बहुत छोटा समझते थे और उनके ज्ञान के स्थान से अनभिज्ञ थे। इसी कारण शीया एकत्रित हुए और उन्होंने इमाम जवाद अलैहिस्सलाम से भेंट की। शीयों का उद्देश्य यह था कि वह इमाम से कुछ प्रश्न करके देखें कि वह इमाम बनने के पात्र हैं या नहीं। शीयों ने कई प्रश्न पूछे जब उन्हें संतोषजनक उत्तर मिल गया तो वे आश्वस्त हो गये कि इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम ही उनके नवें इमाम हैं।

इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ने जो शास्त्रार्थ किये हैं वे बहुत अच्छे व रोचक हैं। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ने आयु कम होने के बावजूद विभिन्न धर्मों के विद्वानों से शास्त्रार्थ किये हैं। इन शास्त्रार्थों से इमाम के ज्ञान का स्थान भलिभांति स्पष्ट हो जाता था। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ज्ञान की सभाओं में बहुत से मामलों का समाधान इस प्रकार करते थे कि उनके विरोधी भी उनके ज्ञान के स्थान को स्वीकार करने पर बाध्य हो जाते थे। इब्ने हजर हैसमी लिखते हैं” मामून ने उन्हें अर्थात इमाम जवाद अलैहिस्सलाम को अपना दामाद बनाने के लिए चुना। क्योंकि उम्र कम होने के बावजूद वे समस्त ज्ञानों में सब विद्वानों में श्रेष्ठ थे”

इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ने शिष्यों की प्रशिक्षा और ईश्वरीय धर्म इस्लाम के प्रचार- प्रसार के लिए बहुत प्रयास किये हैं। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम मदीना में पवित्र कुरआन की व्याख्या की सभायें आयोजित करते और लोगों की ज्ञान की प्यास बुझाते थे। शीया मुसलमानों के बहुत बड़े विद्वान शेख तूसी ने ११३ रावियों के नाम लिखे हैं जिन्होंने इमाम जवाद अलैहिस्सलाम से हदीसें अर्थात कथन लिखे हैं। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम अपने काल के कुछ वैचारिक एवं सही राजनीतिक अभियानों के आधार भी थे और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले भी इस संबंध में इमाम के संपर्क में थे और अपनी- अपनी आर्थिक सहायताओं को इमाम के पास भेजते थे और इमाम इन पैसों को सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में खर्च करते थे। लोगों से इमाम का यह संपर्क बहुत कठिन परिस्थिति में होता था इसलिए इमाम कभी- कभी अपने अनुयाइयों के लिए रहस्यमयी ढंग से पत्र लिखने के लिए बाध्य होते थे। एक पत्र में इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ने लिखा” तुम्हें ज्ञान प्राप्त करना चाहिये क्योंकि वह सबके लिए अनिवार्य है और ज्ञान की बातें करना और उसके बारे में अध्ययन अच्छी चीज़ है। ज्ञान धार्मिक बंधुओं को एक दूसरे से जोड़ता है, वह इंसान की हस्ती एवं पुरूषार्थ का सूचक है, वह सभाओं के लिए बेहतरीन उपहार, यात्रा और अकेलेपन का दोस्त है”

लोगों की सेवा और उनकी समस्याओं का समाधान समस्त इमामों की दिनचर्या थी। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम इस संबंध में भी अग्रणी थे। इमाम फरमाते थे” इंसान तीन अच्छी विशेषताओं से ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करता है, बहुत अधिक प्रायश्चित करना, लोगों के साथ नर्मी से पेश आना और अधिक दान देना।“

इमाम जवाद अलैहिस्सलाम के अनुसार लोगों की सेवा इंसान पर ईश्वरीय दया है और इस संबंध में लापरवाही ईश्वरीय नेअमतों के समाप्त होने का कारण बनती है।

इमाम जवाद अलैहिस्सलाम अपने एक बीमार अनुयाई का हाल- चाल पूछने गये। वह रो रहा था मौत से घबरा व परेशान हो रहा था। इमाम ने उससे फरमाया हे ईश्वर के बंदे! क्या तू मौत से डरता है? ऐसा इसलिए है कि तू नहीं जानता कि मौत किस तरह है? अगर तुम्हें बुराइयां घेर लें और अगर तुम्हारे शरीर में घाव लग जायें तो जान लो कि स्नानगृह में स्नान करने से ये समस्त घाव खत्म हो जायेंगे तो क्या स्नानगृह में जाकर अपनी शरीर को धोकर समस्त घावों को साफ नहीं करना चाहोगे? क्या तुम स्नानगृह जाना चाहते हो और यह चाहते हो कि समस्त घाव तुम्हारे शरीर पर बाक़ी रहें!

बीमार ने कहा अलबत्ता इस प्रकार स्नानगृह जाना चाहता हूं कि समस्त घाव धुल जायें। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ने फरमाया मोमिन के लिए मौत वही स्नानगृह है और पापों को धुलने का अंतिम स्थान है। इस आधार पर जब तुम्हें मौत आ गयी तो तुम इस चरण से गुज़र गये वास्तव में समस्त दुःखों से मुक्ति पा गये और प्रसन्नता प्राप्त कर लिये”

बीमार ने जब इमाम जवाद अलैहिस्सलाम की यह बातें सुनी तो उसे आराम मिल गया और वह संतुष्ट हो गया और किसी प्रकार की चिंता के बिना वह परलोक सिधार गया।

हां जब इंसान ने अच्छे कार्य अंजाम दिये हो और उसका दिल ईमान से भरा हो तो वह किसी प्रकार के भय के बिना मौत के लिए तैयार होता है और उसे इस वास्तविकता पर विश्वास होता है कि वह इस मार्ग से समस्त पीड़ाओं से मु  क्ति पा जायेगा और सदैव बाक़ी रहने वाली प्रसन्नता प्राप्त कर लेगा।

इमाम फरमाते हैं तीन चीज़ों से ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त होती है प्रथम पापों और ग़लतियों की अपेक्षा अधिक प्रायश्चित करना और शर्मिन्दगी प्रकट करना।

नई टिप्पणी जोड़ें