इमाम मूसा काजिम अलैहिस्सलाम

इमाम मूसा काजिम अलैहिस्सलाम

प्रशिक्षण का अर्थ बड़ा करना है इस प्रकार से कि इंसान के भीतर नीहित योग्यताओं को परिपूर्णता तक पहुंचा दें। इस प्रकार शिक्षा व प्रशिक्षा इंसान को आध्यात्मिक परिपूर्णता तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण विषय है और इसमें बच्चे के पैदा होने से पहले तथा उसके बाद के समस्त चरण शामिल हैं।

हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के अनुसार यदि प्रशिक्षा के लिए उपयुक्त भूमि प्रशस्त हो तो बच्चा स्वस्थ पैदा होगा और उसके अंदर अत्यधिक क्षमताएं व योग्यताएं नीहित होंगी तथा इसका श्रेय परिवार और उसके माता-पिता को जायेगा। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म एसे परिवार में हुआ था जो ज्ञान, अध्यात्म, ईश्वरीय भय, निष्ठा और ईश्वरीय बंदगी का प्रतीक था। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जितना समय अपनी पवित्र माता और महान पिता इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की गोद में गुज़रता था उतना ही उनके समक्ष ज्ञान के नये द्वार खुलते थे। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने अपने महान पिता इमाम सादिक अलैहिस्सलाम के पावन अस्तित्व से लाभ उठाया और अपने महान पिता के बाद उनके मार्ग को जारी रखा। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम अपने क्रोध को पी जाते थे इसलिए उनकी एक उपाधी काज़िम अर्थात क्रोध को पी जाने वाली है।

जब बच्चा पैदा होता है तो उसके अंदर प्राकृतिक रूप से बहुत कुछ सीखने की योग्यता व क्षमता मौजूद होती है। इस आधार पर बच्चे के सामने शिक्षा प्रशिक्षा के लिए सही उदाहरण होना चाहिये जिनका वह अनुसरण करे अन्यथा उसकी शिक्षा -प्रशिक्षा सही नहीं होगी। अली बिन अबू हमज़ा नाम के हदीस बयान करने वाले एक व्यक्ति कहते हैं” एक दिन मैं इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से भेंट के लिए गया। मैंने देखा कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम खेत में काम कर रहे हैं और उनके शरीर से पसीना बह रहा है। यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ मैंने कहा हे पैग़म्बरे इस्लाम के बेटे मैं आप पर कुर्बान हो जाऊं। लोग कहां हैं कि वे देखें कि इस प्रकार की प्रचंड गर्मी में आप काम कर रहे हैं। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम ने फरमाया हे अली! जो लोग मुझसे बेहतर थे वे लगातार परिश्रम करते थे और वे सब एक प्रकार का काम करते थे। मैंने कहा आपका तात्पर्य कौन लोग हैं? इमाम ने जवाब दिया मेरा तात्पर्य पैग़म्बरे इस्लाम, अमीरूल मोमिनीन यानी हज़रत अली अलैहिस्सलाम और हमारे दूसरे पूर्वज हैं कि सब पर ईश्वर का सलाम हो कि सब काम करते थे”

उसके बाद इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम ने फरमाया जिस प्रकार का कार्य मैं कर रहा हूं और तुम उसे देख रहे हो वह कार्य समस्त ईश्वरीय दूतों ने किया है और उस प्रयास के माध्यम से अपनी आजीविका की आपूर्ति करते थे”

शिक्षा- प्रशिक्षा का एक सिद्धांत यह है कि हर चीज़ को उसके उचित स्थान रखा जाये। यानी  हर चीज़ को उसका उचित स्थान दिया जाये और हर प्रकार के भेदभाव से दूरी की जाये। अलबत्ता इस बिन्दु पर ध्यान दिया जाना चाहिये कि अंतर और भेदभाव में फर्क है। यानी अगर किसी के साथ अंतर व भिन्न व्यवहार किया जा रहा है तो इसका यह मतलब नहीं है कि उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। उदाहरण स्वरूप अगर दो बच्चे हों एक दो साल का और दूसरा पांच साल का हो। दोनों खाना खा रहे हों तो दोनों को समान खाना देना न्याय नहीं है बल्कि कम उम्र वाले को कम और अधिक उम्र वाले को अधिक खाना देना ही न्याय है। यहां अंतर ही न्याय है। अगर कोई दोनों बच्चों को बराबर और समान रूप से खाना देता है तो यह न्याय के विरुद्ध होगा। बच्चों की शिक्षा- प्रशिक्षा में इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उनके साथ समान बर्ताव हो। अगर बच्चों की शिक्षा- प्रशिक्षा में उनके साथ भेदभाव किया जायेगा तो उनके मन मंा द्वेष उत्पन्न होगा। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम अपने पूर्वजों के हवाले से इस प्रकार कहते हैं” एक व्यक्ति ने अपने दो बेटों में से एक को चूमा और दूसरे को चूमे बिना छोड़ दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने उससे फरमाया क्यों तुम उन दोनों के मध्य समान बर्ताव नहीं कर रहे हो?

बच्चों के बीच भेदभाव अगर सही व तार्किक हो तो उनकी प्रगति का कारण बनता है। क्योंकि इससे उनके मध्य सही प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न व मज़बूत होगी। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम कुछ अवसरों पर बच्चों के मध्य अंतर करते थे। रेफाआ बिन मूसा नाम के व्यक्ति ने इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम से पूछा हे पैग़म्बरे इस्लाम के बेटे एक व्यक्ति के कई बेटे हैं क्या एक को दूसरे पर श्रेष्ठ समझना सही है? इमाम ने उत्तर दिया हां कोई बात नहीं है क्योंकि हमारे पिता इमाम सादिक़ मुझे मेरे बड़े भाई अब्दुल्लाह पर प्राथमिकता देते थे”

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम अपने बेटे इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को अपने दूसरे बेटों पर प्राथमिकता देते थे और उन्हें दूसरे बेटों का आदर्श बताते थे और श्रेष्ठता व प्राथमिकता का कारण भी बयान फरमाते थे। इस्हाक बिन मूसा कहता है कि इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम अपने बच्चों से कहते थे” तुम्हारा भाई आले मोहम्मद का विद्वान है अपने धर्म के बारे में उससे पूछो और वह जो कुछ कहता है उसे याद कर लो। निःसंदेह हमारे पिता अबू जाफर मुझसे फरमाते थे कि आले मोहम्मद का विद्वान तुम्हारी संतान से होगा काश मैं उसे देखता निः संदेह उसका नाम अमीरूल मोमिनीन अली के नाम पर होगा”

बच्चों के बीच अंतर करना बहुत ही संवेदनशील एवं सूक्ष्म कार्य है और इस संबंध में बहुत ही ध्यान से काम लेने की आवश्यकता है। क्योंकि यह संभव है कि बच्चे उस अंतर को भेदभाव समझें। तो माता- पिता को चाहिये कि जिस समय वे अपने बच्चों के मध्य अंतर कर रहे हों इस प्रकार का व्यवहार करें कि बच्चे उसे भेदभाव न समझें। इसी प्रकार इस बात पर ध्यान दें कि प्राथमिकता का कारण पूर्ण रूप से स्पष्ट हो। इसी प्रकार माता- पिता को चाहिये कि वे बहुत ही अच्छे अंदाज़ में श्रेष्ठता व प्राथमिकता का कारण बयान करें।

नसीहत, बुराई से रोकना और अच्छाई का आदेश देना वह चीज़ है जो इंसान को लापरवाही और निश्चेतना से रोकती है और यह लोगों की शिक्षा व प्रशिक्षा के लिए इमाम मूसा काजिम अलैहिस्सलाम की एक शैली थी। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम सदैव लोगों को नसीहत करते थे। इस प्रकार से कि इस्लामी इतिहास में है कि एक बार इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने कहा कि रात- दिन के अपने समय को चार भागों में बांटने का प्रयास करो। समय का कुछ भाग ईश्वर की उपासना के लिए, कुछ भाग आजीविका कमाने के लिए, कुछ भाग अपने धार्मिक भाइयों और उन विश्वास पात्र लोगों के साथ गुजारने के लिए जो आपकी कमियों को आपको बताते हैं और आपके प्रति निष्ठान हैं और समय के शेष भाग को वैध आनंद लेने और घुमने टहलने के लिए। समय का यह भाग इस बात का कारण बनता है कि तुम पहले वाले तीन भागों के दायित्वों के निर्वाह में मज़बूत हो जाओगे कभी यह न कहो कि मैं लोगों के साथ हूं बल्कि यह कहो कि मैं उनमें से एक हूं” इमाम मूसा काजिम अलैहिस्सलाम का यह कथन पैग़म्बरे इस्लाम के उस कथन की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने कहा है कि इस प्रकार न कहो कि मैं लोगों के साथ हूं। अगर लोगों ने अच्छा कार्य किया तो मैं भी अच्छा कार्य करूंगा और लोगों ने बुरा कार्य किया तो मैं भी बुरा कार्य करूंगा बल्कि स्वयं की प्रशिक्षा इस प्रकार करो कि अगर लोगों ने अच्छा कार्य किया तो तुम भी अच्छाई करो और अच्छाई दिखाओ और अगर उन्होंने बुरा किया तो तुम उनकी बुराई से दूरी करो”
नमाज़ धर्म का स्तंभ और समस्त अच्छाइयों का स्रोत है। यद्यपि नमाज़ हर इंसान के बालिग़ होने पर अनिवार्य होती है परंतु इंसान को चाहिये कि वह बालिग़ होने से पहले अपनी संतान को नमाज़ पढ़ना सिखाये। इस प्रकार वे जल्दी ईश्वरीय कृपा व दया के पात्र बन जायेगें तथा अच्छाईयों व सदगुणों से सम्पन्न होने के लिए शीघ्र कदम उठायेंगे। जो बच्चा बचपने से नमाज़ पढ़ने लगता है वह महान ईश्वर की उपासना का मीठा स्वाद जल्द चखता है और उसका दिल पापों के कड़वे स्वाद को पसंद नहीं करता है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन अपनी संतानों को बालिग़ होने से पहले ही नमाज़ सीखा देते थे। इमाम काज़िम अलैहिस्लाम भी अपने अनुयाइयों से सिफारिश करते और कहते थे कि जब तुम्हारे बच्चे सात वर्ष की आयु के हो जायें तो उन्हें नमाज़ पढ़ने का आदेश दो”

इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम नमाज़ के लिए बच्चों को डांटने फटकारने को सही नहीं समझते थे। जैसाकि एक व्यक्ति ने एक दिन अपने बेटे की शिकायत की तो इमाम ने फरमाया अपने बेटे को मत मारो बल्कि उसे समझाने के लिए उससे क्रोधित हो जाओ परंतु इस बात का ध्यान रखो कि तुम्हारा क्रोध  लंबा न खिंचे”

इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” मेरे बेटे! उस पाप से परहेज़ करो कि ईश्वर तुम्हें उसमें देखे जिससे उसने मना किया है और इससे बचो कि वह तुम्हें उस उपासना से दूर देखे जिसका उसने तुम्हें आदेश दिया है। तुम्हें प्रयास व परीश्रम मुबारक हो। ईश्वर की उपासना में कोताही से स्वयं को बरी न समझो क्योंकि ईश्वर की उपासना उस तरह नहीं की जा रही है जिस तरह वह है और मज़ाक करने से बचो कि वह तुम्हारे ईमान के प्रकाश को नष्ट कर देगा और तुम्हें हल्का बना देगा और सुस्ती व आलस्य से बचो कि वह लोक- परलोक के लाभों से रोकेगा”

नई टिप्पणी जोड़ें