दोस्ती और दुश्मनी इस्लाम की दृष्टि में 2

दोस्ती और दुश्मनी इस्लाम की दृष्टि में 2

दोस्ती और दुश्मनी को प्रभावित करने वाले कारकों में से एक जानकारी का होना है। प्रेम एवं घृणा या दोस्ती और दुश्मनी जानकारी के बाद ही होती है। इंसान को किसी चीज़ के बारे में जितनी जानकारी होगी उतना ही वह उससे प्रेम करेगा या दूर हो जाएगा। एहयाए ऊलूमे दीन नामक अपनी किताब में ज़ाली लिखते हैं कि मोहब्बत की कल्पना नहीं की जा सकती लेकिन जानकारी प्राप्त करने और पहचानने के बाद। इंसान जब तक किसी चीज़ को नहीं जानता उसे पसंद नहीं करता है। जानकारी से वास्तविकता उजागर होती है, और इंसान स्वाभाविक रूप से वास्तविकता को पसंद करता है और उसकी ओर आकर्षित होता है। यही कारण है कि इमाम हसन मुजतबा (अ) फ़रमाते हैं कि जो कोई भी ईश्वर को पहचान लेता है तो उससे प्रेम करता है।

प्रेम और दोस्ती के परिणामों में से एक उपकार एवं एहसान है। इंसान की रचना कुछ इस प्रकार से की गई है कि जो भी उस पर कोई उपकार करता है वह उसकी ओर आकर्षित होता है और जो उसके साथ बुराई करता है उससे घृणा करता है। इमाम बाक़िर (अ) फ़रमाते हैं कि ईश्वर ने हज़रत मूसा से कहा, हे मूसा लोगों को मेरे उपकारों एवं अनुकंपाओं से अवगत करो, वे मेरे मित्र हो जायेंगे।

प्रेम का दूसरा कारण सुन्दरता को पसंद करना है। सुन्दरता और अच्छाई से प्रेम इंसान की सृष्टि में शामिल है। इसका मतलब है कि इंसान प्राकृतिक रूप से अच्छाई की ओर झुकाव रखता है और बुराई से भागता है। दोस्ती और दुश्मनी का भी यही कारण है। इस्लामी दृष्टिकोण में ईश्वर संपूर्ण गुणों एवं सुन्दरता का संगम है और यह संभव नहीं है कि कोई सुन्दरता और सत्य को पसंद करता हो लेकिन उसका प्रेमी न बने और उसके दुश्मनों से नफ़रत न करे। धर्म में आस्था रखने वाले यानी मोमिन ईश्वर को समस्त गुणों एवं सुन्दरताओं का स्रोत मानते हैं और उससे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। इस्लामी सिद्दान्तों के मुताबिक़, दोस्ती और दुश्मनी ईश्वर के लिए होनी चाहिए और अन्य समस्त लोगों से प्रेम ईश्वर को मद्देनज़र रखकर ही होना चाहिए। निःसंदेह, अगर दोस्ती और दुश्मनी ईश्वर के लिए हो तो इंसान के समस्त संबंध इबादत होंगे और इस प्रकार ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त होने के लिए भूमि प्रशस्त होगी।

अपने दिल की गहराईयों से ईश्वर से प्रेम करो। किसी की भी दोस्ती ईश्वर के लिए विशुद्ध नहीं होगी लेकिन यह कि ईश्वर उसके लिए सबसे अधिक प्रिय हो। जो कोई ईश्वर को पसंद करता है, ईश्वर भी उसे पसंद करता है। ईश्वर के अनुसार, इंसान और ईश्वर की दोस्ती को इस प्रकार से बयान किया गया है, मैं उसका दोस्त हूं कि जो मुझे दोस्त रखता है, उसका साथी हूं जो मेरे साथ रहता है और उसका हमदम हूं जो मेरा गुणगान करता है।

जब दोस्ती और प्रेम का आधार ईश्वर होता है तो इंसान ‘ला इलाहा इलल्लाह अर्थात नहीं है कोई ईश्वर सिवाए अल्लाह के’ कह कर पहले समस्त साम्राज्यवादी शक्तियों और प्रतिका का इनकार करता है और उसके बाद अल्लाह पर ईमान लाता है। इस प्रकार, ईश्वर में आस्था रखने वाला इंसान एक ही साथ दो आयामों का चयन करता है, एक सकारात्मक यानी ईश्वर पर ईमान औऱ दूसरे नकारात्मक यानी अत्याचारों एवं शैतानी ताक़तों का इनकार। धर्म में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को सत्य पर ईमान रखना चाहिए और असत्य के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होना चाहिए। धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति सत्य और असत्य को एक समान नहीं समझ सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर ईश्वर से प्रेम किया जाए और दूसरी ओर असत्य एवं सत्य विरोधियों से दोस्ती। दुर्भाग्यवश आज कुछ मुस्लिम देशों के शासक ऐसी सरकारों और शासकों के सहयोगी हैं कि जो विश्ववासियों पर अधिकतम अत्याचार कर रहे हैं और शैतान का दूसरा रूप हैं। इस प्रकार के शासक अपने देशों और विदेशों में मुसलमानों पर अत्याचार और हिंसा करते हैं। जबकि इस्लामी शिक्षाओं में दोस्ती और दुश्मनी और सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों की रूपरेखा मौजूद है। धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति धर्म के सिद्धांतों का अनुसरण करना चाहता है और अपनी इच्छाओं को ईश्वर की इच्छा के अनुरूप ढालता है। क़ुराने मजीद ने अपनी अनेक आयतों में मोहब्बत और नफ़रत के प्रारूप को स्पष्ट किया है। सूरए मुजादेला की 22वीं आयत में उल्लेख है कि कोई भी क़ौम जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखती हो उसे ईश्वर और उसके दूत के दुश्मनों से मोहब्बत करते हुए नहीं देखोगे। यद्यपि वह उनके बाप, बच्चे या रिश्तेदार ही क्यों न हों। यह वह लोग हैं कि जिनके दिलों पर ईश्वर ने ईमान लिख दिया है... ईश्वर उनसे और वे भी ईश्वर से राज़ी हैं वे अल्लाह का दल हैं और जान लों कि अल्लाह का दल विजयी है। यह आयत इस बात की ओर संकेत करती है कि ईश्वर और उसके दुश्मनों से एक साथ प्रेम संभव नहीं है, और उनमें से केवल एक ही का चयन किया जा सकता है। अगर वास्तव में मोमिन हैं तो ईश्वर के दुश्मनों से दोस्ती करने से बचें। जो लोग दोनों की दोस्ती का दावा करते हैं उनका ईमान कमज़ोर है या वे पाखण्डी हैं। यही कारण है कि धर्म में गहरी आस्था रखने वाले ईश्वर से अधिक किसी से मोहब्बत नहीं करते, यहां तक कि अपने मां-बाप और बहन-भाईयों से मोहब्बत का आधार भी ईश्वर से उनकी दोस्ती को क़रार देते हैं। इस प्रकार, स्पष्ट है कि भावनाएं भी अतार्किक नहीं होनी चाहिएं।

इस्लामी ग्रंथों में मोहब्बत और नफ़रत के विषय को काफ़ी महत्व दिया गया है।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) फ़रमाते हैं कि ईमान का सबसे मज़बूत आधार ईश्वर के लिए दोस्ती और दुश्मनी करना और ईश्वर के दोस्तों से दोस्ती करना तथा उसके दुश्मनों से दुश्मनी करना और दूरी बनाना है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि दूसरों के साथ दोस्ती का आधार ईश्वर होना चाहिए और दोस्ती व दुश्मनी उसी के लिए होनी चाहिए। सामूहिक तौर पर अगर देखें तो ईश्वर से दोस्ती के दो आयाम हैं, एक सकारात्मक आयाम और दूसरा नकारात्मक आयाम। सकारात्मक पहलू से अभिप्राय यह है कि मोमिन इंसान न केवल यह कि ईश्वर, उसके पैग़म्बर और उनके उत्तराधिकारियों से प्रेम करे बल्कि उन्हें अपना स्वामी माने। नकारात्मक पहलू से तात्पर्य यह है कि न केवल शैतान और दुस्टों से दुश्मनी रखें बल्कि उन्हें अपने पास फटकने भी न दें।

कार्यक्रम के अंत में स्पष्ट कर दें कि अगर ईश्वर और ईश्वरीय मूल्य दोस्ती एवं दुश्मनी का आधार बनें तो गुणों से सुसज्जित होने और बुराईयों से दूर होने का अवसर प्राप्त होता है। जो इंसान ईश्वर के दूतों और उसने मित्रों की संगत को पसंद करता है, तो वह ईश्वरीय मूल्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है और सर्वश्रेष्ठ हस्तियों को अपना आदर्शन बनाकर धीरे धीरे बुराईयों से दूर हो जाता है। इस्लाम ने मानवीय संबंधों को ईश्वरीय रंग में रंगकर दूसरों के साथ प्रेम भावना से मेल-जोल को इबादत क़रार दिया है। इस प्रकार लोगों के बीच प्रेम और दोस्ती का विस्तार किया है। ईश्वर के मार्ग में होने वाली दोस्ती स्थायी और मज़बूत होती है।

प्रेम और घृणा से ईश्वरीय आधार एवं सीमाएं निर्धारित होती हैं ताकि ईश्वर में आस्था रखने वाले अपना पक्ष निर्धारित कर सकें और धार्मिक मूल्यों एवं अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकंआ और दुश्मनों के सामने दोस्ती का हाथ न बढ़ाएं।

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