दोस्ती और दुश्मनी इस्लाम की दृष्टि में

दोस्ती और दुश्मनी इस्लाम की दृष्टि में

ब्रह्माण्ड के सिद्धांतों में से एक सिद्धांत, आकर्षण और अपकर्षण का सिद्धांत है। अर्थात दुनिया में हर वस्तु उस चीज़ को स्वीकार करती है जो उसके लिए उचित हो और उसे स्वयं से दूर करती है जो उसके लिए उचित नहीं होती। इंसान की भी इस तरह से रचना की गई है कि वह वास्तविकताओं और स्वयं के लिए उचित चीज़ों को आकर्षित करे और अनुचित चीज़ों को स्वयं से दूर करे। ईश्वर ने इसी उद्देश्य से इंसान में काम वासना और आवेश की शक्ति रखी है ताकि उसके प्रयोग से अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित बना सके। इंसान के भीतर काम वासना इसलिए है कि जो चीज़ें उसे उचित और मुनासिब लगें उन्हें आकर्षित करके अपने जीवन को सुरक्षित बनाए और आवेश एवं क्रोध द्वारा अनुचित चीज़ों को ख़ुद से दूर करे ताकि उसका जीवन सुरक्षित रहे। अगर इंसान में इस तरह की शक्ति नहीं होगी तो प्राकृतिक रूप से वह खाने पीने का प्रयास नहीं करेगा या ख़तरों के मुक़ाबले में प्रतिरोध नहीं करेगा। इसके परिणाम स्वरूप जीवन नष्ट हो जाएगा।

हर इंसान जब अपने भीतर झांकता है तो वह पाता है कि प्रेम और इच्छा और इसी तरह आवेश एवं क्रोध उसके अस्तित्व में शामिल है। इंसान की समस्त गतिविधियां भी इच्छा करने और इच्छा न करने पर निर्भर हैं। वास्तव में यही आतंरिक एवं मानसिक शक्ति उसके कार्यों में चयन और इरादे का स्रोत है।

जैसा कि आप जानते हैं, इंसान आज़ादी एवं चयन की योग्यता जैसी मूल्यवान अनुकंपा का स्वामी है। उसे मुक्ति की प्राप्ति या उस पर प्रकोप का आधार भी उसके द्वारा आज़ादी से चयन किए गए कर्मों पर निर्भर है। किसी काम का इरादा या इच्छा या उससे घृणा का संबंध आत्मा से है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने जीवन में समस्त लोगों की अनदेखी नहीं कर सकता या उनके बारे में समान विचार नहीं रख सकता। इसलिए कि हर बुद्धिमान व्यक्ति अपने जीवन में कुछ उद्देश्य रखता है, और सामान्य रूप से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कुछ चीज़ों को वरीयता देता है वह उनसे प्रेम करता है, जबकि कुछ चीज़ों से घृणा करता है। अन्य इंसानों की ओर से प्रेम और स्नेह देखकर वह उनके प्रति आकर्षित होता है और इसके परिणाम स्वरूप उनका मित्र बन जाता है, उनके काम आता है और वे भी उसके कामों में हाथ बटाते हैं।

इस प्रकार, भावनाएं, विशेष रूप से प्रेम एवं घृणा इंसान के कामों को दिशा प्रदान करने की आश्चर्यजनक शक्ति रखती हैं। यही कारण है कि इस्लामी शिक्षाओं में इस विषय पर विशेष ध्यान दिया गया है। दोस्ती और दुश्मनी इंसान की विशिष्ट सृष्टि को बयान करती है। जिस समय से हज़रत आदम (अ) के बेटे हाबील की हत्या की गई और यहां तक कि उससे पहले जब शैतान ने अपने अहं के कारण हज़रत आदम के सामने सजदा करने से इनकार कर दिया तो दोस्ती और दुश्मनी प्रकट हो गई और ब्रह्माण्ड में अच्छाई एवं बुराई का मुक़ाबला शुरू हो गया। इस तरह इंसान के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं, सच्चाई का रास्ता और बुराई का रास्ता, उसे उनमें से किसी एक के चयन का अधिकार होता है। अब हमें यह जानने की ज़रूत है कि कौन सी चीज़ दोस्ती के क़ाबिल है और कौन सी चीज़ दुश्मनी के?

एक हदीस में उल्लेख है कि ईश्वर ने मूसा से कहा, क्या कभी तुमने मेरे लिए कोई कार्य किया है? मूसा ने कहा हां, मैंने तेरी इबादत की है, तेरे लिए रोज़ा रखा है तेरे नाम पर दान दिया है और तेरा गुणगान किया है। ईश्वर ने कहा, इबादत तुम्हारे लिए सत्य की निशानी है और रोज़ा नरक से बचाने की ढाल और दान प्रलय के दिन तुम्हें छाया प्रदान करेगा। मेरा गुणगान भी तुम्हारे लिए प्रकाश है, ज़रा अब बताओ कौन सा कार्य तुमने केवल मेरे लिए किया? मूसा ने कहा, ईश्वर तू ही मेरा मार्गदर्शन कर, ईश्वर ने कहा, क्या कभी तुमने मेरे कारण किसी से दोस्ती की है या किसी से घृणा की है? अब मूसा को ज्ञात हुआ कि सबसे सर्वश्रेष्ठ कर्म ईश्वर के कारण किसी से दोस्ती या दुश्मनी करना है।

प्रेम और दोस्ती या घृणा और दुश्मनी के बारे में जो महत्वपूर्ण बिंदु है वह यह कि दोस्ती और दुश्मनी को दूसरे कामों के साथ नहीं रखा जाता है, बल्कि यह दोनों अन्य कार्यों को ऊर्जा प्रदान करते हैं। इमाम बाक़िर (अ) की हदीस है कि अगर तू यह जानना चाहता है कि तू अच्छा आदमी है तो अपने दिल में झांक कर देख। अगर ईश्वर के आदेशों का पालन करने वालों से प्रेम करता है और पापियों से घृणा तो समझ ले अच्छा आदमी है और ईश्वर तुझसे प्रेम करता है, लेकिन अगर ईश्वर के आदेशों का पालन करने वालों से घृणा करता है तो अच्छा बंदा नहीं है और ईश्वर तेरा दुश्मन है। इंसान हमेशा उसके साथ होता है जो उससे प्रेम करता है।

इमाम बाक़िर का यह कथन इस्लामी व्यवस्था में दोस्ती और दुश्मनी के प्रभावी स्थान को स्पष्ट करता है। धार्मिक नैतिक मान्यताओं के दृष्टिगत मूल रूप से स्वस्थ, अच्छा-भला और प्रभावी व्यक्ति वह है कि जिसके प्रेम एवं घृणा का आधार ईश्वर बन चुका है।

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपने साथियों से पूछा, ईमान का सबसे मज़बूत स्तंभ कौन सा है? हज़रत के साथियों ने उत्तर में कहा, ईश्वर के दूत हमसे अधिक जानते हैं, कुछ लोगों ने कहा, नमाज़ है, अन्य कुछ ने कहा, ईश्वर के मार्ग में दान करना, दूसरे कुछ लोगों ने कहा, हज और उमरा है, कुछ ने कहा, जेहाद है। पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, जो कुछ भी तुमने कहा उनकी अपनी श्रेष्ठता है, लेकिन वह यह नहीं है, ईमान का सबसे मज़बूत स्तंभ ईश्वर के मार्ग में दोस्ती और दुश्मनी और ईश्वर के मित्रों से मित्रता एवं उसके शत्रुओं से शत्रुता है।

इस बात के दृष्टिगत इंसान की दोस्ती और दुश्मनी का आधार ईश्वर होना चाहिए। यह ऐसी स्थिति में है कि जब कुछ लोग कि जो मोमिन और मुसलमान होने का दावा करते हैं उनके कार्य ईश्वरीय आधार एवं कसौटी से विरोधाभास रखते हैं। यह वे लोग हैं कि जिन्होंने इस्लामी जगत के चप्पे चप्पे को युद्ध क्षेत्र बना दिया है और रक्तपात में व्यस्त हैं, उन्होंने अपनी दोस्ती का आधार अपनी शैतानी इच्छाओं को क़रार दिया है और क़ुराने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीसों की ग़लत व्याख्या करके इस्लामी मूल्यों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया है। वे केवल ईमान का ज़बान से दावा करते हैं लेकिन उनकी दोस्ती एवं दुश्मनी का आधार कदापि ईश्वर नहीं है। उनकी गतिविधियों का निर्धारण शैतानी इच्छाओं द्वारा होता है न कि ईश्वरीय प्रेम द्वारा। इन इच्छाओं ने उनकी गर्दनों में फंदा डाल दिया है और वह जिस ओर चाहती हैं उन्हें मोड़ देती हैं। अगर दिल ईश्वर और उसके पैग़म्बर के प्रेम का स्थान बन जाए तो किसी भी स्थिति में निर्दोष लोगों और मुसलमानों के नरंसहार को सहन नहीं कर सकता और ईश्वर और उसके दूतों के रास्ते से अलग नहीं जा सकता। ईश्वर सूरए फ़तह की 29वीं आयत में उन लोगों के बारे में कि जो पैग़म्बरे इस्लाम के साथी हैं फ़रमाता है कि मोहम्मद ईश्वर के दूत हैं और जो लोग उनके साथ हैं वे काफ़िरों के मुक़ाबले में बहुत कठोर और अपनों के बीच बहुत दयालु हैं। इस आधार पर कोई भी सच्चा इंसान दूसरे सत्यवादी इंसान से दुश्मनी नहीं कर सकता। सूरए हश्र की दसवीं आयत में अपने धार्मिक भाईयों से दोस्ती और प्रेम के संदर्भ में उल्लेख है कि हे हमारे पालनहार, हमें और हमारे भाईयों को कि जो हम से पहले ईमान लेकर आए क्षमा कर दे और धर्म में आस्था रखने वाले के प्रति हमारे दिलों में ईर्ष्या न डाल।

इस आयत के मुताबिक़, मोमिन का दिल दूसरे मोमिनों के प्रति ईर्ष्या एवं दुश्मनी का स्थान नहीं है। क़ुराने मजीद ने आपस में घृणा से बचने और दोस्ती व प्रेम का आदेश दिया है।

नैतिक सिद्धांतों के मुताबिक़, ऐसे लोगों से दुश्मनी एवं घृणा जो उसके पात्र नहीं हैं नैतिक बुराई है। उसके विपरीत, ऐसे लोगों से दुश्मनी एवं घृणा जो उसके पात्र हैं नैतिक अच्छाई एवं गुण है।

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