विश्व क़ुद्स दिवस इतिहास के आइने में

विश्व क़ुद्स दिवस इतिहास के आइने में

दसियों वर्षों से फ़िलिस्तीन का नाम उस अत्याचारग्रस्त जनता के दुखों व पीड़ाओं की याद दिलाता है जिसे अपनी मातृभूमि से निकाल दिया गया है और हर दिन वह एक नई समस्या से जूझ रही है। ६० वर्ष से अधिक का समय बीत रहा है कि फ़िलिस्तीन की भूमियों पर जायोनियों ने अतिग्रहण कर रखा है और इस्लामी जगत अभी तक फ़िलिस्तीन तथा क़ुद्स की स्वतंत्रता हेतु कोई गम्भीर कार्यवाही नहीं कर सका है।

स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैहि फ़िलिस्तीन की अत्याचारग्रस्त जनता की दयनीय स्थिति और इस्लामी जगत के प्रति जायोनी शासन के ख़तरों के संदर्भ में सदैव चेतावनी देते थे। आपने लगभग ३० वर्ष पूर्व इस्लामी जगत में जागरुकता उत्पन्न करने और इसलिए कि वह फ़िलिस्तीन की स्वतंत्रता के मामले को अपने ध्यान का केन्द्र बनाये, विश्व के मुसलमानों से मांग की थी कि वे हर वर्ष पवित्र रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन में प्रदर्शन करें। ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम खु़मैनी रह. का यह सुझाव, जिसे वर्ष १९७९ में क्रांति की सफलता के कुछ महीनों बाद ही प्रस्तुत किया गया, ईरान की इस्लामी व्यवस्था की ओर से फ़िलिस्तीनी जनता के पूर्ण समर्थन का सूचक है। यह समर्थन अब भी विभिन्न रूपों में जारी है और फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन में विश्व के मुसलमानों की अधिक से अधिक एकजुटता का कारण बना है।

विश्व कुद्स दिवस

स्वर्गीय हज़रत इमाम खुमैनी रह. ने वर्ष १९७९ में अपने संदेश में फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन में विश्व के मुसलमानों की ओर से प्रदर्शन किये जाने के कारणों को इस प्रकार बयान किया" मैं इस्लामी जगत के समस्त मुसलमानों और इस्लामी सरकारों से चाहता हूं कि अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन एवं उसके समर्थकों का प्रभाव कम करने के लिए एकजुट हो जायें तथा मैं समस्त मुसलमानों से चाहता व अनुरोध करता हूं कि पवित्र रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को चुनें तथा फ़िलिस्तीनी मुसलमानों के अधिकारों के समर्थन में मुसलमानों के अंतरराष्ट्रीय समर्थन की घोषणा करें" फ़िलिस्तीनी जनता के प्रति समर्थन की जड़ें हर वस्तु से पूर्व इस्लाम और पवित्र कुरआन की शिक्षाओं में हैं। क्योंकि इस्लाम में अत्याचारग्रस्त के समर्थन पर बल दिया गया है चाहे वह मुसलमान न भी हो। पवित्र कुरआन में मुसलमानों को संबोधित किया गया है कि क्यों ईश्वर के मार्ग में और अत्याग्रस्त व कमज़ोर व्यक्तियों को मुक्ति दिलाने के लिए, जो अत्याचारियों के चंगुल में फंस गये हैं और तुमसे सहायता मांग रहे हैं, संघर्ष के लिए खड़े नहीं होते।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम भी फरमाते हैं" जो मुसलमान एक मुसलमान की आवाज़ सुने कि वह सहायता मांग रहा है और उसकी सहायता न करे तो वह मुसलमान नहीं है"इस आधार पर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के मुसलमानों का दायित्व है कि वे समस्त अत्याचारग्रस्त व्यक्तियों विशेषकर फ़िलिस्तीनी जनता की सहायता करें कि जो वर्षों से ज़ायोनियों के नाना प्रकार के अत्याचारों का सामना कर रही है

फ़िलिस्तीनी ६० वर्ष पहले ज़ायोनियों द्वारा अपनी भूमियों के अतिग्रहण के बाद से दयनीय दशा में जीवन बिता रहे हैं। लाखों फ़िलिस्तीनियों को बेघर कर दिया गया है और वे शरणार्थी जीवन व्यतीत करने पर बाध्य हैं तथा १० हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीनी जायोनी शासन की भयावह जेलों में बंद हैं जहां उन्हें नाना प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है और उन्हें ज़ायोनियों के अमानवीय व्यवहारों का सामना है। लगभग प्रतिदिन ज़ायोनी सैनिक कुछ फ़िलिस्तीनियों को शहीद या घायल करते हैं। इसके अतिरिक्त जायोनी शासन ने पिछले वर्ष से ग़ज्जा पटटी की आर्थिक घेराबंदी तीव्र कर दी है और अमेरिका तथा युरोपीय सरकारों के समर्थन से फ़िलिस्तीन के इस घनी आबादी वाले क्षेत्र में खाद्यपदार्थों, दवाओं और ईंधन को नहीं पहुंचने दे रहा है। अलबत्ता हालिया दिनों में जायोनी शासन ने अंतरराष्ट्रीय दबावों तथा फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध के कारण ग़ज्जा पट्टी के अमानवीय परिवेष्टन में कुछ कमी कर दी है।

दूसरी ओर जायोनी शासन अवैध अधिकृत क्षेत्रों, विशेषकर बैतुल मुक़द्दस में यहूदी कालोनियों का निर्माण करके इस नगर को एक जायोनी नगर में परिवर्तित करने की चेष्टा में है। इसी प्रकार जायोनी, मस्जिदुल अक़्सा के पास सुरंग खोदकर तथा दूसरी विध्वंसक कार्यवाहियां करके मस्जिदुल अक़्सा को, जो मुसलमानों का पहला क़िबला है, क्रमश: तबाह करने की कुचेष्टा में हैं ताकि उसके स्थान पर सुलैमान उपासना स्थल बना सकें।

जायोनियों के अपराधों के संबंध में ध्यानयोग्य बिन्दु यह है कि जायोनी शासन को सदैव पश्चिमी सरकारों का, जो स्वयं को मानवाधिकारों की रक्षक बताती हैं, समर्थन प्राप्त रहा है परंतु अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर अमेरिका और कुछ युरोपीय देशों के वर्चस्व के कारण फ़िलिस्तीनी जनता इन संगठनों के समर्थन से भी वंचित हो गयी है। यहां तक कि जब फ़िलिस्तीनी जायोनियों के मुकाबले में प्रतिरोध करते हैं तो पश्चिमी सरकारें और प्रचार माध्यम इनके वैध प्रतिरोध को आतंकवाद का नाम देते हैं तथा उसकी भर्त्सना करते हैं। इस प्रकार फ़िलिस्तीनी जनता पर किया जा रहा अत्याचार दो बराबर हो गया है। अत: अब फ़िलिस्तीनी जनता ने केवल इस्लामी जगत की सहायताओं से आस लगा रखी है।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई फ़िलिस्तीन की अत्याचारग्रस्त जनता के मुक़ाबले में इस्लामी राष्ट्रों की जिम्मेदारियों के संबंध में फ़िलिस्तीनी जनता को संबोधित करते हुए कहते हैं" इस्लामी राष्ट्र का दायित्व है कि वह यथासंभव आपकी सहायता करे और इस पवित्र मार्ग को जारी रखने में आपकी सहायता करे" आप इस संबंध में कि इस्लामी राष्ट्र क्या कर सकते हैं, इस प्रकार फरमाते हैं" राष्ट्र क्या कर सकते हैं? विश्व कु़द्स दिवस के अवसर पर सड़कों पर आ सकते हैं, नारे लगा सकते हैं, अपनी मुट्ठियां बांधकर संघर्षरत फ़िलिस्तीनी जनता को यह दिखा सकते हैं कि हम तुम्हारे समर्थक व तुम्हारे साथ हैं। उनका यह कार्य फ़िलिस्तीनी जनता का मनोबल बढायेगा जो बहुत बड़ी सहायता है"

वास्तव में विश्व कुद्स दिवस मनाना वह न्यूनतम सहायता है जो विश्व के मुसलमान अपने फ़िलिस्तीनी भाई बहनों की कर सकते हैं परंतु इसी कार्य का अब तक बहुत सकारात्मक परिणाम निकला है।

विश्व कुद्स दिवस प्रतिवर्ष जायोनियों और उनके पश्चिमी समर्थकों को चेतावनी देता है कि फ़िलिस्तीनी जनता अकेली नहीं है और पूरे विश्व के मुसलमान उसकी आकांक्षाओं का समर्थन करते हैं। इसके अतिरिक्त आज होने वाले समारोह से फ़िलिस्तीनी जनता का मनोबल ऊंचा होगा जो बहुत बड़ी सहायता है और इस बात का कारण बनेगा कि वह दृढ़ संकल्प के साथ अपने क़ानूनी अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष जारी रखे। फ़िलिस्तीनी जनता के प्रतिरोध और उसके प्रति इस्लामी राष्ट्रों के समर्थन के कारण आज जायोनी शासन हर समय से अधिक अपमानित एवं कमजोर हो चुका है। यद्यपि जायोनी फ़िलिस्तीनी जनता को शहीद व घायल कर रहे हैं और उस पर नाना प्रकार के आर्थिक व राजनैतिक दबाव डाल रहे हैं परंतु विभिन्न साक्ष्य इस बात के सूचक हैं कि काफी समय पूर्व से जायोनी शासन के अंत की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। फ़िलिस्तीनियों पर जायोनियों के दबाव के बावजूद फ़िलिस्तीनियों ने जायोनी शासन को कुठारा घाव लगाया है इस प्रकार से कि जायोनी सेना गज्जा पट्टी से पीछे हटने पर विवश हो गयी। दूसरी ओर जायोनी शासन की सेना, जो अपने आपको मध्यपूर्व की सबसे शक्तिशाली सेना कहती व समझती थी, ६ वर्षों के दौरान लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध संगठन हिज़्बुल्लाह के हाथों अपमानजनक ढंग से अब तक दो बार पराजित हो चुकी है।

जायोनी शासन को इस्राईल के अंदर भी बहुत सारी कठिनाईयों व समस्याओं का सामना है। अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन से यहूदियों के पलायन की उल्टी प्रक्रिया इस शासन के अधिकारियों की गहरी चिंता का कारण बनी है। यह एसी स्थिति में है सामाजिक एवं नैतिक बुराईयों ने जायोनी समाज को हिलाकर रख दिया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि जायोनी शासन के अधिकारी भी आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक बुराईयों में संलग्न हैं और यह समस्या उनके प्रति लोगों के अविश्वास का कारण बनी है। इसी कारण था कि एहूद ओलमर्ट ने अपने प्रधानमंत्री काल के अंतिम दिनों में घोषणा की थी"कि महा इज़राईल की विचारधारा समाप्त हो चुकी है और अब इस विषय का अस्तित्व ही नहीं रह गया है, जो व्यक्ति भी इस बारे में बात करता है वह केवल स्वंय से धोखा देता है" यह ऐसी स्थिति में है जब कुछ वर्षों पूर्व तक जायोनी अपने आरंभिक नेताओं की विचारधारा के अनुसार इस्राईल का विस्तार मिस्र की नील नदी से लेकर इराक़ की फोरात नदी तक करने की कल्पना व मांग करते थ।

विश्व क़ुद्स दिवस के अवसर पर होने वाले प्रदर्शन व रैली, वास्तव में विश्व के मुसलमानों की एकता का प्रतीक भी हैं। पवित्र रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को अर्थात आज इस्लामी राष्ट्रों ने दर्शा दिया कि वे फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन के लिए एकजुट हैं। इसके अतिरिक्त विश्व क़ुद्स समारोह दूसरी वास्तविकता के भी सूचक है और वह यह है कि फ़िलिस्तीनी जनता की आकांक्षाओं के प्रति मुसलमानों के समर्थन के बावजूद बहुत सी सरकारें विशेषकर अरब जगत फ़िलिस्तीनी जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रहा है। क्योंकि यदि वास्तव में अरब सरकारें गम्भीर रूप से एकजुट होकर फ़िलिस्तीनियों की सहायता करतीं तो अब तक फ़िलिस्तीनी जनता की बहुत से कठिनाईयों का समाधान हो चुका होता परंतु कुछ अरब सरकारों ने न केवल ऐसा नहीं किया बल्कि खुले और गुप्त ढंग से उन्होंने अतिग्रहणकारी इस्राईल की ओर मित्रता का हाथ बढाया है और व्यवहारिक रूप से अपनी तथा फ़िलिस्तीनी जनता के मुक़ाबले में खड़ी हो गयी हैं।

इन सबके साथ जो लोग अत्याचारियों के समक्ष डट जाते हैं और प्रतिरोध करते हैं महान ईश्वर ने उन्हें सफलता की शुभसूचना दे रखी है। फ़िलिस्तीन, इस्लामी जगत का सबसे संकटग्रस्त क्षेत्र है और यदि इस क्षेत्र व मोर्चे पर प्रतिरोध का न किया गया तो वर्चस्वादी व्यवस्था इस्लामी जगत के दूसरे क्षेत्रों में पांव पसारने के लिए प्रोत्साहित हो सकती है। इसी कारण ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्जा सैयद अली खामनेई कहते हैं" आज समस्त इस्लामी जगत को चाहिये कि वह फ़िलिस्तीन की समस्या को अपनी समस्या समझे। यह रहस्यमयी की कुंजी है जो इस्लामी राष्ट्रों के लिए सफलता के दरवाज़ों को खोलेगी।

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