बेसत के दिन अमीरुल मोमिनीन के रौज़े पर होने वाला चमत्कार
बेसत के दिन अमीरुल मोमिनीन के रौज़े पर होने वाला चमत्कार
अमीरुल मोमिनीन (अ:स) की ज़ियारत इस रात के तमाम अमाल में बेहतर व अफ़ज़ल है, इस रात में इमाम (अ:स) की तीन ज़ियारातें हैं जिन का ज़िक्र बाद में आएगा! ख़्याल रहे की मशहूर सुन्नी आलिम अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद इब्ने बतूता ने 600 साल पहले पवित्र शहर मक्का और नजफ़'अशरफ़ का सफ़र किया और अमीरुल मोमिनीन के रौज़े पर हाज़िरी दी, इन्होंने अपने सफ़र नामा (रहला इब्ने बतूता) में मक्का से नजफ़-अशरफ़ में दाख़िल होने के बाद जो अमीरु मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ:स) के रौज़े का ज़िक्र करते हुए एक वाक़या तहरीर किया है की
इस शहर के रहने वाले सब के सब राफ़ज़ी हैं, और इस रौज़े से बहुत से करामत ज़हूर में आती हैं, यह लोग लैलातुल महया (जागने की रात) जो 27 रजब की रात है, इसमें कूफ़ा, बसरा ख़ुरासान, और फारस व रोम वगैरा से हर बीमार, मफ्लूज, शल-शुदा, और अपाहिज क़ो यहाँ लाते हैं, जिनकी गिनती लगभग 30-40 होती है, वो लोग नमाज़े इशा के बाद इन अपाहिजों क़ो अमीरुल मोमिनीन (अ:स) की ज़रीहे-मुबारक पर ले जाते हैं जहां बहुत से लोग इनके इर्द गिर्द जमा हो जाते हैं, इनमे से कुछ नमाज़, तिलावत और ज़िक्र में मशगूल होते हैं और कुछ सिर्फ़ इन बीमारों क़ो ही देखते रहते हैं की वो कब तंदुरुस्त होकर उठ खड़े होंगे! जब आधी या दो तिहाई रात गुज़र जाती है तो जो अपाहिज हिल भी न कर सकते थे वो इस हालत में उठते हैं की इन्हें कोई बीमारी नहीं होती, और कलमा तैय्येबा "ला इलाहा इलल'लाह, अलीयुन वली'उल्लाह (لااِلہ اِلاّ الله محمّد رّسوْل اللهِ علِیّ ولِیّ اللهِ ) पढ़ते हुए वहाँ से रवाना हो जाते हैं!
यह मशहूर करामत है, लेकिन मै खुद उस रात वहाँ मौजूद न था, लेकिन नेक और भरोसे वाले लोगों ने मुझे यह अपनी ज़बानी बताया है, इसी कारणवश मैंने अमीरुल मोमिनीन (अ:स) के रौज़ा-ए-अक़दस के क़रीब मौजूद मदरसा में तीन आदमी देखे जो अपाहिज ज़मीन पर पड़े थे इनमें से एक इस'फ़हान का दूसरा ख़ुरासान का और तीसरा रोम से था! मैंने इन से पूछा, " तुम लोग तंदुरुस्त क्यों नहीं हुए?" वो कहने लगे के, "हम 27 रजब क़ो यहाँ नहीं पहुँच सके, इसलिए अगले 27 रजब तक हम यहीं रहेंगे ताकि हमें शिफ़ा हासिल हो और फिर हम वापस जायेंगे" आख़िर में इब्ने बतूता कहते हैं की इस रात दूर दराज़ शहरों के लोग ज़ियारत के लिये इस रौज़े अक़दस पर जमा हो जाते हैं और यहाँ बहुत बड़ा बाज़ार लगता है जो दस दिन तक जमा रहता है!
लिखने वाले यह कहते हैं की लोग इस वाक़ये क़ो अजीब न समझें क्योंकि इन मशाहिद मौशार्र्फा (पवित्र स्थलों) से इनते चमत्का हुए हैं जिन की गनती नहीं हो सकती! चुनान्चेह शव्वाल के महीने (1343 इसवी) में पापी उम्मत के ज़ामिन इमाम सामिन यानी अबुल हसन इमाम अली रज़ा (अ:स) के पवित्र मशहद- में तीन अपाहिज औरतें लायी गयीं, जिन के इलाज से डाक्टर और हकीम परेशान हो गए थे! इनको वहाँ से शिफ़ा मिली और वो तंदुरुस्त होकर इस रौज़े से वापस गयीं! इस मशहद-ए-मुबारक के मोएज्ज़ात व करामात के ऐसे गवाह हैं, जैसे आसमान पर सूरज का चमकना, और बद'दुओं के लिये हरम-ए-नजफ़ के दरवाज़े का खुलना हर शक से परे है! इन औरतों के बारे में डाक्टरों कहना था कि हम तो यही समझते थे कि यह औरतें कभी स्वस्थ नहीं हो सकेंगी, लेकिन इन्हें हरम-ए-मुतःहर से शिफ़ा मिल गयी है, फिर इन्होंने बा'कायेदा यह लिख कर भी दिया! अगर यहाँ जगह की कमी न होती तो और बहुत सारे वाकेयात यहाँ ब्यान किये जाते!
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