इमाम काज़िम (अ) के स्वर्ण कथन

इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम के स्वर्ण कथन

कंजूस

कंजूसी एक ऐसा अवगुण है जिसके बारे में इस्लाम ने बहुत कुछ कहा है और लोगों को इससे दूर रहने की चेतावनी दी है, हमे यह याद रखना चाहिए कि मरना हर इन्सान को है लेकिन एक वह है जो अपने पूरे जीवन में केवल माल एकत्र करता रहता है और अंत में सबकुछ छोड़ कर चला जाता है और दूसरा वह है जो उसकी छोड़ी हुई सम्पत्ती को ख़र्च करता है, नेक कार्यों में लगाता है तो माल किसी का लेकिन सवाब ख़र्च करने वाले को मिल रहा है।

यह तो वह कंजूसी हुई जिसके बारे में हर इन्सान जानता है और हम वह लोग जो अपने माल में कंजूसी करते हैं मख्ख़ी चूस कहते हैं लेकिन हमारे मासूम ने हमें एक दूसरे प्रकार की कंजूसी के बारे में बताया है कि जिसको हम अपने जीवन में कंजूसी समझते ही नहीं है और हमे यह हदीस देख कर होशियार हो जाना चाहिए इमाम काज़िम (अ) फ़रमाते हैं कंजूस वह है जो वाजिबात पर अमल करने में कंजूसी करे।

इमाम काजि़म अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं

قال الکاظم علیه السلام:  الْبَخِيلُ مَنْ بَخِلَ بِمَا افْتَرَضَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ عَلَيْهِ

कंजूस वह है जो जो उसमें कंजूसी करे जो ख़ुदा ने उसपर वाजिब किया है और उसको अंजाम न दे।

मौत और क़ब्र

मौत एक वास्तविक्ता है, सबको इस संसार से जाना है, हर चेहरे को मिट्टी में मिल जाना है, यह तो शरीर की हालत है लेकिन हमारी आत्मा का क्या होगा यह हमारे अमाल पर है हमारी आत्मा का वही होना है जो हमारे शरीर ने कार्य किया है, क्योंकि यह आत्मा ही है जो शरीर से सम्बंध रखती है, और इस आत्मा को उसी शरीर के आधार पर सवाब या अज़ाब दिया जाएगा। और इसीलिए रिवायतों में आया है कि क़ब्र हर दिन पाँच बार लोगों से चिल्ला कर कहती है

أنـا بـيـت الـوحـدة فـأجـعـل لـك مـؤنـسـاً قـراءة الـقُـرآن الـكريـم ...

मैं तनहाई का घर हूँ अपने लिए क़ुरआन की तिलावत का मोनिस लेकर आना

أنـا بـيـت الـظُـلـمـة فـنـورنـي بـصـلاة الـلـيـل ...

मैं अंधेरे का घर हूँ मुझे अपनी नमाज़े शब से नूरानी करो

أنـا بـيـت الـتُّـراب فـأحـمـل الـفـراش وهـو الـعـمـل الـصَّـالـح ...

मैं मिट्टी का घर हूँ अपने लिए बिस्तर का प्रबंध करो और वह नेक अमल है

أنـا بـيـت الأفـاعـي فـأحـمـل الـتـريـاق وهـو بـاسـم الله ...

मैं डसने वाले जानवरों का घर हूँ अपने लिए उनके ज़हर के तोड़ का प्रबंध लाना और वह बिसमिल्लाह है

मौत के बारे में हदीस में आया है कि मौत एक साया है जिससे कोई भाग नहीं सकता इसीलिए क़ुरआन फ़रमाता है

قُلْ إِنَّ الْمَوْتَ الَّذِي تَفِرُّونَ مِنْهُ فَإِنَّهُ مُلَاقِيكُمْ

(सूरा जुमा आयत 8)

इसी भूली हुई वास्तविक्ता की तरफ़ ख़बरदार करते हुए इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं

قال الکاظم علیه السلام:عند قبر حضره ان شيئا هذا آخره لحقیق ان یزهد فی اوله و ان شيئا هذا اوله لحقیق ان یخاف آخره

इमाम काज़िम (अ) एक क़ब्र के पास हाज़िर थे और आपने फ़रमायाः जिस चीज़ (जीवन) का अंत यह हो उसके लिए बेहतर यह है कि उसके आरम्भ (दुनिया) में ज़ोहद और दूरी रखी जाए, और जिस जीवन (आख़ेरत) का आरम्भ यह हो उसके अंत के लिए बेहतर यह है कि डरा जाए।

अच्छा पड़ोसी

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैह की सीरत में यह है कि वह जब भी दुआ करती थी तो पहले पड़ोसी के लिए दुआ करती थी और यह उनसे इसके बारे में प्रश्न किया जाता तो वह फ़रमाती थीं की पहले पड़ोसी का हक़ होता है।

इसी पवित्र ख़ानदान से सम्बंध रखने वाले हमारे और सारे शियों के सातवे इमाम, इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम अच्छे पड़ोसी के बारे में फ़रमाते हैं

قال الکاظم علیه السلام: لَيْسَ حُسنُ الجِوارِ كَفَّ الْاَذي وَ لكنْ حُسنُ الجِوارِ صَبْرُك علي الْاَذي

अच्छा पड़ोसी होना केवल यह नहीं है कि वह अपने पड़ोसियों को परेशान न करे, बल्कि अच्छा पड़ोसी होना यह है कि अपने पड़ोसियों द्वारा परेशान किये जाने पर भी सब्र करे।

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