हर रोज़ एक क़दम आगे बढ़ना चाहिए

हर रोज़ एक क़दम आगे बढ़ना चाहिए

प्रिय पाठकों ! किसी भी वुजूद के ज़िंदा होने की सब से आसान और साफ़ निशानी उसका बढ़ना और तरक़्क़ी करना है। जब भी उसका बढ़ना रुक जाये समझलो कि उसकी मौत का ज़माना क़रीब आ गया है। और जब भी कोई ज़िन्दा वुजूद गर्त के मुहाने पर जा खड़ा हो तो समझलो कि उसकी मौत धीरे धीरे उसकी तरफ़ बढ़ रही है। और यह क़ानून किसी एक इंसान की मानवी और माद्दी ज़िन्दगी पर ही नही बल्कि पूरे समाज पर लागू है। (इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।)

इस नुक्ते से फ़ायदा उठाते हुए- अगर हम हर रोज़ एक क़दम आगे न बढ़ायें और ईमान, तक़वा, अखलाक़, अदब ,पाकीज़गी व शिष्टाचार के मैदान में आगे न बढ़ें और हर साल गुज़रे हुए साल पर अफ़सोस करें तो हमें समझ लेना चाहिए कि हमने एक बहुत बड़ा नुक़्सान किया है और हम अपनी राह से भटक गये हैं। लिहाज़ा इस हालत में हमें लापरवाही नही बरतनी चाहिए बल्कि गंभीरता के साथ ख़तरे को महसूस करना चाहिए।

अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इस बारे में कितना अच्छा जुमला बयान फ़रमाया है, एक मशहूर रिवायत में है कि आपने फ़रमाया “मन इस्तवा यौमाहु फ़हुवा मग़बून” यानी जिसके दो दिन एक से हो गये वह नुक़सान उठाने वालों में से है (क्यों कि उसने ज़िन्दगी की पूंजी को तो अपने हाथ से गवाँ दिया मगर कोई लाभ नहीं उठाया नतीजे में अफ़सोस और हाथ मलने के अतिरिक्त उसे कुछ भी नही मिला।) “व मन काना फ़ी नक़सिन फ़ल मौतु ख़ैरुन लहु।”यानी जो नुक़्सान की मंज़िल में चला गया उसके लिए तो मौत ही बेहतर है (क्योँ कि कम से कम इंसान नुक़्सान से ही बचा रहे, इसलिए कि नुक़्सान से बचा रहना भी एक बहुत बड़ी नेअमत है।)

इसी लिए कहा गया है कि इन्सान को हर दिन अपना हिसाब करना चाहिए ताकि अगर कहीँ पर कोई ऐब या नक़्स रह गया हो तो उसको दूर किया जा सके।

लिहाज़ा अपने हाल से ग़ाफ़िल न रहो ताकि ज़िन्दगी की तिजारत में उम्र की बेतरीन पूंजी को सबसे ऊँची नेमतों से बदला जा सके। और “इन्नल इंसाना लफ़ी ख़ुसरिन” (जान लो कि तमाम इंसान घाटे में है।) का मिसदाक़ न बनो। और यह तिजारत तो वह है जिस में हर इंसान एक बड़ा नफ़ा हासिल कर सकता है। अपने नफ़्स के हिसाब से ग़ाफ़िल न रहो और इस से पहले कि तुम से तुम्हारे आमाल का हिसाब लिया जाये हर रोज़ व हर माह अपने आमाल का हिसाब करते रहो।

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