मर्दों की दुनिया में सफ़ल शिया महिलाएं

मर्दों की दुनिया में सफ़ल शिया महिलाएं

सफल महिला श्रंखला के अन्तर्गत हम ईरान की कुछ और सफल महिलाओं से आपको परिचित करवा रहे हैं।

डाक्टर सूदाबे दावरान

आज हम नैनो तकनीक के क्षेत्र में दक्ष ईरानी महिला डाक्टर सूदाबे दावरान का उल्लेख करेंगे।

नैनो टेक्नालाजी ऐसा शब्द है जो उन आधुनिक तकनीकों के लिए बोला जाता है जिनमें नैनो स्केल की सहायता से कार्य किया जाता है। सामान्य रूप से नैनो स्केल का तात्पर्य, लगभग एक नैनो मीटर या एक मीटर के एक अरबवें भाग पर काम किया जाता है। नैनो एक प्रकार की तकनीक है जिसमें अणुओं या कोशिकाओं की विशेषताओं में परिवर्तन उत्पन्न करके नये पदार्थों का उत्पादन किया जाता है। आज देशों को विकासशील या पिछड़ा हुआ कहने के महत्त्वपूर्ण मानदंडों में से एक, देशों द्वारा विभिन्न आयामों में इस टेक्नालाजी से लाभ उठाए जाने का स्तर भी है। वर्तमान समय में नैनो टेक्नालाजी उन तकनीकों मे से है जो प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होने में देशों को सहायता करती है। वर्तमान समय में ईरानी विशेषज्ञों ने नैनो टेक्नालाजी को प्राप्त कर लिया है और इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की हैं। वर्तमान समय में ईरान, नैनो टेक्नालाजी में प्रगति करके क्षेत्र में मध्यपूर्व में पहले स्थान पर और विश्व में बीसवें स्थान पर है। ईरानी शोधकर्ता अनथक प्रयासों द्वारा नैनो टेक्नोलोजी के क्षेत्र में विभिन्न उत्पाद व आविष्कार कर रहे हैं। इसी के साथ नैनो तकनीक के क्षेत्र में ईरानी महिलाओं का नाम भी चमक रहा है और वे भी अपनी क्षमताओं का लोहा मनवा रही हैं।

श्रीमती डाक्टर सूदाबे दावरान उन सफल महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने नैनो तकनीक के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की हैं। इस सफल ईरानी महिला की फ़ाइल बहुत सी वैज्ञानिक उपलब्धियों से भरी पड़ी हैं। उन्हें वर्ष 2007 में ईरान और इस्लामी जगत की मेधावी महिला के रूप में चुना गया। इसके अतिरिक्त श्रीमती डाक्टर सूदाबे लगातार चौथी बार तबरेज़ चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के अनुसंधानिक केन्द्र की सबसे बड़ी शोधकर्ता और वर्ष 2008 में विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी शोधकर्ता चुनी गयीं। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने वर्ष 2008 में श्रीमती सूदाबे को वर्ष की सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक के रूप में चुना गया। इसी प्रकार इस विश्वविद्यालय के बायोग्राफ़ी केन्द्र आइबीसी ने लगातार दो वर्षों तक उन्हें 21वीं शताब्दी की सबसे मेधावी वैज्ञानिक की श्रेणी में रखा।

श्रीमती सूदाबे दावरान ने तबरेज़ विश्वविद्यालय से दवाओं में पालीमर की उपयोगिता के विषय पर पीएचडी की डिग्री प्राप्त की और इसी प्रकार वे इसी विश्वविद्यालय में दवा निर्माण संकाय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर भी रहीं। अबतक श्रीमती सूदाबे के 35 आलेख विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इसी प्रकार इन्होंने 15 आविष्कार पंजीकृत भी कराण हैं। श्रीमती सूदाबे का नाम पालीमर शोध के संबंध में WHO IS WHO नामक इन्साइक्लोपीडिया में प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान समय में ईरान की यह शोधकर्ता दवाओं की दो महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं पर कार्य कर रहीं हैं और इसके प्रबंधक की ज़िम्मेदारी भी निभा रही हैं। इनमें से एक कैंसर की बीमारियों के उपचार के लिए आधुनिक पालीमर सिस्टम का निर्माण है और दूसरी स्मार्ट सिस्टम का पता लगाना है जिससे भविष्य में ओरल इंसुलिन बनाया जा सके।

डाक्टर सूदाबे कैंसर की कुछ ग्रंथियों के उपचार में प्रयोग के लिए स्मार्ट पालिमर के एक प्रकार के विकसित आधुनिक स्मार्ट POLYMERIC नैनोकणों का आविष्कार करने में सफल रहीं हैं। वह इस योजना की प्रस्तुतिकर्ता के रूप में इस बात को मानती हैं कि पश्चिम के स्मार्ट नैनोकणों के माध्यम से लक्ष्यपूर्ण दवाओं के निर्माण की शैली कैंसर के स्थान पर विशेष प्रकार की दवाओं को पहुंचाने के लिए प्रभावी मार्ग है। पोलिमर के स्मार्ट POLYMERIC नैनोकणों के प्रयोग से उपचार की उपयोगिता में वृद्धि और साइड इफ़ेक्ट कम हो सकता है। उनका मानना है कि पालीमर की इस संरचना में विशेष प्रकार के अणु भरे जाते हैं जो कैंसर की कोशिका की पहचानकर उससे जुड़ सकती है। इसी प्रकार ईरान की इस आविष्कारक महिला का मानना है कि दीर्धावधि में धीरे धीरे मनुष्य के शरीर में दवाओं को पहुंचाना, नैनो शैली की विशेषता है और इससे कीमियों थ्रैपी के साइड इफ़ेक्ट भी कम होते हैं। श्रीमती सूदाबे का मानना है कि कैंसर निरोधक दवाओं को पहुंचाने की नई शैली का उद्देश्य, शरीर के स्वस्थ भाग पर दवा के कुप्रभावों को रोकना, इस बीमारी की यथाशीघ्र और इसके यथाशीघ्र उपचार की संभावना उत्पन्न करना है।

डाक्टर सूदाबे से जब यह कहा गया कि राज़ी चिकित्सा विज्ञान समारोह में वह चुनीं गयीं और यह समारोह किस विषय पर था, इस बारे में कुछ विवरण दें तो उन्होंने कहा कि वर्ष 2003 में आयोजित होने वाले इस समारोह में मैंने पहला स्थान प्राप्त किया। वहां पर मेरा काम आइबोप्रोफ़ेन के नये डेरिवेटिव जो त्वचा में अवशोषित हो जाता है, तैयार करना था। क्योंकि आइबोप्रोफ़ेन ऐसी दवा है जो इन्फेक्शन के समय खाई जाती है और बहुत से इन्फेक्शनों और हड्डियों के दर्दों के लिए बहुत ही लाभदायक है किन्तु इसके साइड इफ़ेक्ट विशेषकर अमाशय में घाव करने सहित पाचनतंत्र पर इसके पड़ने वाले प्रभावों ने इसके प्रयोग को सीमित कर दिया है। हमने आइबोप्रोफ़ेन से ऐसा सिस्टम बनाया है जो त्वचा में अवशोषित हो जाता है और दर्द के स्थान पर इसे मरहम के रूप में रखा जा सकता है। इस स्थिति में यह त्वचा में अवशोषित होकर सूजे हुए स्थान पर पहुंच जाता है। इससे अमाशय और आंत में घाव सहित पाचन तंत्र में कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती।

श्रीमती दावरान से जब यह कहा गया कि इंसुलिन दवा बनाने की योजना पर भी उन्होंने कार्य आरंभ किया है, इस बारे में कुछ विवरण दें, तो उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मधुमेह ऐसी बीमारी है जिसने विकसित और विकासशील देशों के लिए वास्तव में एक जटिल समस्या उत्पन्न कर दी है और इस बीमारी में ग्रस्त लोगों की संख्या में दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। इस बीमारी में ग्रस्त लोगों को इंसुलिन का इंजेक्शन लगाने में समस्या होती है। विशेषकर युवाओं और बच्चों को इसका इंजेक्शन लगाने से बहुत अधिक दर्द होता है। इसीलिए संसार के बहुत से शोध केन्द्र, विश्वविद्यालय और शोधकर्ता ओरल इंसुलिन पर कार्य कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सुश्री दावरान एक अनुसंधानिक टीम की प्रमुख हैं और आठ वर्षों से इस परियोजना पर कार्य कर रही हैं। उनका कहना है कि इस संबंध में प्रकाशित होने वाली समस्त वैज्ञानिक उपलब्धियों से हमने लाभ उठाया और हमने ईरान में इस क्षेत्र में बहुत रचनात्मक प्रयास किये हैं और हमें आशा है कि यथाशीघ्र हम ओरल इंसुलिन बनाने के सिस्टम को मान्यता दिलवाकर बाज़ार में प्रस्तुत कर सकेंगे।

श्रीमती दावरान से जब यह पूछा गया कि रसायन शास्त्र के विषय चुनने के लिए किसने आपको प्रेरित किया तो उन्होंने कहा कि मेरी मुख्य प्रेरणा मेरे पिता थे। मेरे पिता प्रोफ़ेसर हुसैन दावरान ईरान में रसायन विज्ञान में अग्रणी और ध्वज वाहक थे। उन्होंने उस समय के छात्रों के मध्य रूचि और प्रेरणा की भावना जागृत की। उनके बहुत से छात्र वर्तमान समय में देश के भीतर और विदेश में ज्ञान अर्जित कर रहे हैं। मैंने भी बचपन से यह देखा कि वह इस ज्ञान में बहुत अधिक रूचि रखते थे। हमारे घर में एक प्रयोगशाला है जिसके कारण मैं इस ज्ञान में अधिक रूचि रखने लगी। उसके बाद पीएचडी के समय जब मैंने यह देखा कि चिकित्सा विज्ञान सहित विभिन्न उद्योगों में पालीमर्स का बहुत अधिक महत्त्व है तो मैंने इस विषय की ओर रूख किया और जैसा कि मुझे दवा निर्माण से बहुत अधिक लगाव था इसीलिए मैंने फ़ार्मास्युटिकल पालीमर्स के विषय का चयन किया।

श्रीमती दावारान का एक पुत्र है जो हाईस्कूल का छात्र है। उनके पति भी विश्वविद्यालय एकेडमी के सदस्य हैं। ईरान की इस उदाहरणीय महिला का मानना है कि महिलाओं को समाज में अपनी गतिविधियों को सफल बनाने के लिए अपने ज्ञान, जागरूकता और निपुणता में वृद्धि करना चाहिए और उन्हें वर्तमान विज्ञान और तकनीक के कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए। जब श्रीमती सूदाबे से यह पूछा गया कि क्या उन्हें समाज और अपने घर के मध्य भूमिका के समन्वय में किसी भी प्रकार की समस्या का सामना है? तो उन्होंने कहा कि मैंने घर और बाहर के काम के लिए कार्यक्रम बना रखा है और घर का काम स्वयं करती हूं। अपने परिवार के लिए स्वयं खाना पकाती हूं। बाहर के काम के लिए भी मैंने कार्यक्रम बनाया है किन्तु मेरा मानना है कि एक महिला की वास्तविक सफलता, पारिवारिक वातावरण में विक्लांग हो जाती है। एक महिला के महत्त्व के स्तर को, कार्यालय में उसकी उपयोगिता और उस भागीदारी के स्तर से आंका जाता है जो उसने सफल मनुष्यों के प्रशिक्षण में निभाई है। यदि हम एक पत्नी और एक मां के रूप में अपनी भूमिका को सही रूप से अंजाम न दे सके तो हमें समाज में भी बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। महिला को समाज और घर के मध्य अपने दायित्वों और समय का संतुलित विभाजन करना चाहिए। ऐसी स्थिति में वे स्वीकार योग्य ढंग से अपने समस्त कार्यक्रमों को प्रस्तुत कर सकती हैं।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में ईरान की मेधावी महिलाओं की प्रगति

वर्तमान समय में हम चिकित्सा और उपचार के क्षेत्र में देशों की प्रगतियों के साक्षी हैं। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने भी स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है जिसके समाचार आए दिन प्रकाशित होते रहते हैं। इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के कारण इस युद्ध में घायल होने वाले बहुत से लोगों को जटिल शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ी और यह कठिन शल्य चिकित्सा, जटिल परिस्थितियों में ईरानी डाक्टरों के हाथों हुई। इसीलिए ईरानी चिकित्सकों ने आर्थोपेडिक्स, हड्डियों के आपरेशन और टूटे हुए भागों को जोड़ने के क्षेत्र में अपने अनुभवों से लाभ उठाते हुए रोचक उपलब्धियां अर्जित की हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में सफल ईरानी महिलाओं में से एक डाक्टर मरियम इस्लामी हैं। डाक्टर मरियम इस्लामी का जन्म दक्षिणी ईरान के शीराज़ नगर में हुआ। उन्होंने शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही डाक्टर बनने की ठान ली थी। शोध में उनकी रूचि अद्भुत थी। इसीलिए जापान, रूस और मिस्र जैसे देशों में उनके 10 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय आलेख हैं।

श्रीमति डाक्टर इस्लामी ने विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की ओर से बेहतरीन आविष्कारक के रूप में स्वर्ण पदक, मानद उपाधि और नक़द उपहार प्राप्त किए। श्रीमती इस्लामी ने वर्ष 2008 में जेनेवा में आविष्कार, नई तकनीक और नवीनीकरण नामक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के छत्तीसवें दौरे में भाग लिया और उन्होंने इस मुक़ाबले में स्वर्ण पदक जीतने और मानद उपाधि प्राप्त करने में सफल रहीं। इसी प्रकार विशेष पुरस्कार, मानद उपाधि और आविष्कारकों को दिया जाने वाला मोलदाविया की अंतर्राष्ट्रीय फेडरेशन का मैडल भी इस ईरानी बुद्धिजीवी को प्रदान किया गया।

ईरानी चिकित्सा विशेषज्ञ श्रीमति मरियम इस्लामी ने चार वर्षों तक तीन हज़ार हड्डियों के रोगियों पर शोध करके, हड्डियों के बढ़ने और उन्हें जोड़ने के संबंध में नये और महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने शोध के परिणामों को हड्डियों के बढ़ने और जुड़ने की आश्चर्यजनक बातें नामक पुस्तक का रूप दिया है। यह पुस्तक आर्थोपेडिक्स के विश्वसनीय और मान्यता प्राप्त प्रोफ़ेसरों के ध्यान का केन्द्र बनी। इस ईरानी चिकित्सक ने एक्सटरनल फ़िक्सेटर के क्षेत्र में आविष्कार किया है जिसका उपयोग टूटी हुई हड्डियों को हिलने डुलने से रोकने के लिए किया जाता है। इस संयंत्र में अन्य शैलियों की तुलना में 31 से अधिक विशेषताएं पायी जाती हैं और इस संयंत्र से अब तक बहुत से रोगियों का उपचार हो चुका है।

ईरान की इस प्रसिद्ध महिला चिकित्सक ने अपने आविष्कार के बारे में साक्षात्कार में कहा कि इस शैली में काटपीट की आवश्यकता नहीं होती और इसमें संक्रमण की संभावना भी बहुत कम है और सुन्दरता की दृष्टि से भी जब इस संयंत्र को शरीर से निकाल लिया जाता है तो उसका चिन्ह शरीर पर बाक़ी नहीं रहता है। इस प्रकार से शरीर पर इस यंत्र को लगाने के बाद रोगी अपने व्यक्तिगत कार्यों को अंजाम दे सकता है। इस प्रकार से इस बात के दृष्टिगत कि इस यंत्र में पेचों को इस प्रकार सेट किया जाता है कि यदि आपरेशन के बाद रोगी ज़मीन पर गिर जाए या उसे कुछ हो जाए तो बिना आपरेशन किए केवल रोगी को लिटाकर बहुत सरलता से उसकी समस्या दूर की जा सकती है। इस यंत्र में यह भी योग्यता और क्षमता है कि यदि चिकित्सक दक्ष हो तो भुजाओं, गट्टे और हथेलियों जैसे शरीर के अंगों का एक साथ आपरेशन किया जा सकता है।

श्रीमती डाक्टर इस्लामी विश्व की बेहतरीन आविष्कारक महिला के रूप में चुने जाने के बारे में कहती हैं कि पांच वर्ष पूर्व मैंने हड्डियों के रोगों से संबंधित व्यापक शोध आरंभ किया था और इस उपचार की शैली को मैंने तीन हज़ार से अधिक रोगियों पर अनुभव किया, उसके बाद मैंने अपने शोध के परिणाम को पुस्तक का रूप दिया। इसी प्रकार मैंने जापान, मिस्र और रूस जैसे देशों में वर्ष 2006 से वर्ष 2008 तक अंतर्राष्ट्रीय कांफ़्रेंसों में दस से अधिक अंतर्राष्ट्रीय आलेख प्रस्तुत किये। वर्ष 2007 के अंत में संसार के आविष्कारकों के मुक़ाबले में भाग लेने के लिए मुझे निमंत्रण मिला उसके बाद मैं जेनेवा गयी। विश्व के 48 देशों के 1500 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में यह प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई और इस मुक़ाबले में भाग लेने वालों में अधिकांश रूसी आविष्कारक थे जिनकी संख्या 130 थी। जजों ने तीन दिनों तक फ़ैसला किया। अंत में तीन अप्रैल को विश्व बौद्धिक संपदा संगठन wipo का विशेष पुरस्कार, पदक, मोलदाविया के आविष्कारकों के संघ और विश्वविद्यालय की मानद उपाधि के साथ साथ स्वर्ण पदक और जेनेवा के ज्यूरी की मानद उपाधि भी प्राप्त की।

यह ईरानी आविष्कारक महिला, एक मुसलमान ईरानी महिला के रूप में संसार में पहले नंबर पर आने की अपनी भावना को इस प्रकार व्यक्त करती हैं कि मैं बहुत ही प्रसन्न हुं, एक मुसलमान ईरानी महिला के रूप में मैं अपने देश के ध्वज को संसार में ऊंचा कर सकी और ईरान विशेषकर ईरानी महिलाओं के विरुद्ध किए जा रहे दुष्प्राचारों के बावजूद मैं उनका मुक़ाबला शिक्षा के हथियार से करने में सफल रहूं।

उन्होंने व्यक्ति के लिए परिवार के समर्थन को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया। उनका मानना है कि उनकी प्रगति, विकास और उनके आध्यात्म और शिक्षा स्तर को बढ़ाने के लिए उनके परिवार ने बहुत अधिक पैसे ख़र्च किए। उनका कहना है कि मेरी मां ने धार्मिक शिक्षा के आधार पर हमें सिखाया कि ख़ुशियों में अधिक ख़ुश नहीं होना चाहिए और कठिनाईयों में अधिक परेशान नहीं होना चाहिए, हमें धीरज रखना चाहिए। वे इस सफलता को मुझपर और मेरे परिवार पर ईश्वर की एक कृपा समझती हैं। इन सबसे महत्त्वपूर्ण इस ईश्वरीय समर्थन की रक्षा है। मेरी मां की बातें मुझे पवित्र क़ुरआन की याद दिलातीं हैं। पवित्र क़ुरआन में ईश्वर कहता है कि ईश्वर किसी की विभूतियों को उससे छीनना नहीं चाहता किन्तु हममें उसको सुरक्षित रखने की योग्यता और क्षमता नहीं है।

डाक्टर मरियम इस्लामी की दृष्टि में सफल और उदाहरणीय महिला वह महिला है जिसने मानवीय मूल्यों की रक्षा की। उनका कहना है कि मैने बचपन से अपनी शिक्षा को इस उद्देश्य से जारी रखा कि मैं संसार के समक्ष एक परदेदार महिला का उचित और सकारात्मक आदर्श प्रस्तुत कर सकूं और तर्कसंगत और सुव्यवस्थित ढंग से ईरानी महिलाओं की क्षमताओं और योग्यताओं को संसारवासियों के समक्ष प्रस्तुत करूं। मैं जितनी भी प्रतिस्पर्धाओं में उपस्थित हुई, पूरे हेजाब के साथ उपस्थित हुई और मैंने उनको समझाया कि मेरा यह वस्त्र, मेरे देश और मेरी संस्कृति का भाग है और महिलाओं के लिए इससे कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। यात्रा के दौरान बारम्बार मुझसे ईरान और ईरानी महिलाओं के बारे में पूछा जाता है तो मैं वास्तविकता को उनसे बयान करती हूं।

यह सफल ईरानी महिला भविष्य में आर्थोपेडिक्स के क्षेत्र में अधिक दक्षता प्राप्त करना चाहती है। वह कहती हैं कि मेरे नये आविष्कार पर पूंजीनिवेश करके हड्डी की समस्याओं विशेषकर पवित्र प्रतिरक्षा के दौरान विक्लांग हुए योद्धाओं की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। हम मध्यपूर्व क्षेत्र में मुख्य ध्रुव बन सकते हैं, जैसा कि हम देखते हैं कि बहुत से यूरोपीय देश के रोगी अपने उपचार के लिए ईरान का चयन कर रहे हैं। यह चीज़ ईरान के वैज्ञानिक और आर्थिक स्तर को बढ़ाने के लिए उचित सहायक है। श्रीमती मरियम इस्लामी का कहना है कि उनकी सफलता का श्रेय ईश्वर की कृपा है और जीवन के संबंध में उनकी दृष्टि आशा और सकारात्मक विचारधारा से सदैव ओतप्रोत रही है।

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