इस्लाम धर्म में शादी का महत्व
इस्लाम धर्म में शादी का महत्व
पवित्र इस्लाम धर्म में विवाह के लिए ताकीद की है, जो एक नारी व पूरुष के गुणवली चाहीदा को पूरण करता है, और इस्लाम ने इस चीज़ के लिए बड़ा गूरुत्व व ताकीद की है।
हदीस में वर्णन हूआ हैः की इस्लाम में विवाह एक ऐसी चीज़ है चीज़ से बड़ कर और अपर कोई चीज़ नहीं हो सक्ति और ना इंसान इस से बड़ी आशा प्रकाश कर सकता है। इस्लाम में एक परीवार बनाने के लिए इस से उत्तम और कोई चीज़ बयान नहीं की है। इस्लाम में इस विवाह को आधा दीन बताया है हदीस में ईर्शाद हेः विवाहित व्यक्ति अपने अधे धर्म का संरक्षक किया है।
मानव जीवन में जब यौन का एक ढेव ख़ेलता है तो इस्लाम उस समय को विवाह करने का एक उत्तम समय बताया है। और इस्लाम में बालक के लिए 15 साल और बालिका के लिए 9 साल बयान किया है। इस्लाम कि दृष्ट में वेह दोनों के लिए उम्र होने का एक उत्तम समय निर्धारण किया है. और इस समय वेह दोनों विवाहित बंधन से जुढ़ सक्ते है। हालाकी इस्लाम में बालक व बालिका के लिए एक मुनासिबत को बयान नहीं किया है। और ना उस विषय को निर्वाचन किया है, एक मुस्लमान नारी व पूरुष के मर्ज़ि की मुताविक़ अपने विवाह के ज़रीए समस्त प्रकार रिश्तेदारी व अपना चाहिदा के पूर्ण कर सकता है।
नतीजे में समाज और मुआशिरा को एक ख़राब मुआशिरा से बचा सकता है। इस्लाम में नारी व पूरुष को हराम पद्धती से मिला-मिशा रिश्तेदार को हराम क़रार दिया है और नारीयों के लिए पर्दा व हिजाब परिधान करने के लिए ताकीद क़रार दिया है। नतीजे में समाज में ख़राब चरित्र का परिमाण कम होगा, और परिवार बंधन की एक मजबूत ख़ुूटी बनेगी। बीबी व शौहर के लिए मौहब्बत के साथ ज़िन्दगी करने का समय फराहम हो जाये गा और ईमान व इमान्दारी के साथ अपनी आख़लाक़ी ज़िम्मेदरी को निभाना व सम्पादन में क मोह्काम सहायता मिलेगा। बीबी अपने गृह के तमाम काम और शौहर कि चाहतायों को पूर्ण करेगी और शौहर बाहर के तमाम प्रकार का काम विशेष करके अर्थव्यावस्था को सठिक करेंगें।
अगर सब ऐसी ज़िन्दगी करने पर राज़ी हो जाएं तो भविष्य नस्ल कि उज्ज्वल होने में एक उत्तम कारण बनेगा । इस्लाम में नारीयों को भारी व कठिन काज-काम से बिरत रहने का निर्देश दिया है। और गृह में तमाम प्रकार कामों को अंजाम देने का निर्देश जारी किया है, लेकिन इस काम से बिरत रहने का निषेध जारी नहीं किया. अलबत्ते यह बात परिष्कार है की इस्लाम में नारीयों के लिए बाहर का कार्य करने का निशेध व विरोध नहीं किया है।
लेकिन वेह काम जो नारीयों के लिए मूनासिब और खूबसूरत है। और यह व्यतीत समस्त कामों को हराम घोषित किया है। लेकिन इस्लाम में नारीयों के लिए ज्ञान अर्जन करना जाएज़ अथवा मजबूर किया है। यह कहना अवश्यक है, की पश्चिम देशों के समस्त ज्ञानी व्यक्तियों ने इस चीज़ को क़बूल किया है कि सही व सालिम जीवन बसर करना समस्त शरिरीक चाहतों को पूर्ण करता है। और मानव जीवन में शान्ति विस्तार के लिए सहायता मिलता है। सही व सालिम संतान अर्जन करना और अपनी तक़दीर को अच्छा बनाने के लिए इस्लाम ने जो उत्तम विधान बनाया है वेह यह है कि इस्लाम को अपना धर्म क़रार दे और विवाह करके एक परिवर, बिवी व शौहर के तमाम दायित्व को अंजाम दें । सही व सालिम ज़िन्दगी बसर करना वगैरह….। यह सब मानव जीवन से संम्धिंत है।
अगर इंसान इस्लामी आईन व निर्देश के मुताविक़ ज़िन्दगी बसर करे और उस क़ानून पर अमल करे, तो यक़ीनन इंसान का नसीब और तक़दीर परिवर्तन हो जाए गा. और सारी मौसीबतें और दुःख़ से मुक्त हो जाएगा।
दितीयः समाज में अच्छे सदाचरण के साथ पेश आना, तथाः माता-पिता संतान, रिश्तेदार, गुरु, शार्गिदों के साथ इस्लामी सदाचरण से पेश आना वगैरह…. और समाज में इस्तरह ज़िन्दगी बसर करने से व्यक्तियों के दर्मियान अमन, मुहब्बत, शान्ति लाता है ।
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