नमाज़ और साफ़ सफ़ाई
नमाज़ और साफ़ सफ़ाई
नमाज़ी के लिबास और बदन का पाक होना ज़रूरी है। अगर निजासत का एक ज़र्रा भी उसके लिबास या जिस्म पर मौजूद हो तो(कुछ खास हालतों को छोड़ कर) नमाज़ बातिल है। जो नमाज़ी यह जानता है कि अगर नमाज़ पढ़ने से पहले मिस्वाक कर ली जाये तो नमाज़ की हर रकत का सवाब सत्तर रकत के बराबर हो जाता है तो वह कभी भी नमाज़ से पहले मिस्वाक करना नही भूलता। जो नमाज़ी यह जानता है कि जनाबत की हालत मे नमाज़ बातिल है।
तो वह नमाज़ से पहले ग़ुस्ल की फ़िक्र करता है। और ग़ुस्ल की फ़िक्र उसको हमाम बनाने की तरफ़ मुतवज्जेह करती है। और हमाम का बन जाना उसके ज़्यादा पाक साफ़ रहने का ज़रिया बनता है।
यह जो नमाज़ीयो से कहा जाता है कि वज़ू के लिए सिर्फ़ 750 मिली लीटर तक पानी इस्तेमाल करो इससे ज़्यादा इसराफ़ है। वह यह समझता है कि वज़ू का पानी एक बार इस्तेमाल होना चाहिए वरना हौज़ या किसी बड़े बरतन से वज़ू करने मे इतना पानी सर्फ़ नही होता।
इससे इस बात की तरफ़ भी तवज्जुह हो जाती है कि किसी को भी यह हक़ नही है कि वज़ू या ग़ुस्ल के बहाने मुऐयन मिक़दार से ज़्यादा पानी बहाये।
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