पवित्र क़ुरआन की "वही" के बारे में मुसलमानों का अक़ीदा

पवित्र क़ुरआन की "वही" के बारे में मुसलमानों का अक़ीदा

क़ुरआने मजीद ने तमाम दूसरी ईश्वरीय और पवित्र किताबों जैसे तौरेत और इंजील आदि से ज़्यादा आसमानी वही (ईश्वर की तरफ़ से आने वाला संदेश) , वही भेजने वाले और वही लाने वाले के बारे में लिखा है और यहाँ तक कि वही की गुणवत्ता के बारे में भी लिखा है।

मुसलमानों का आम अक़ीदा अलबत्ता अक़ीदे का आधार वही क़ुरआने मजीद का प्रत्यक्ष पहलू है। क़ुरआन के बारे में यह है कि क़ुरआने मजीद अपने बयान के अनुसार अल्लाह का कथन है जो एक बड़े फ़रिश्ते के ज़रिये जो आसमान का रहने वाला है, नबी ए इस्लाम पर नाज़िल हुआ है।

उस फ़रिश्ते का नाम जिबरईल और रुहुल अमीन है जिस ने अल्लाह के कथन को तेईस वर्ष की अवधि में धीरे धीरे इस्लाम के दूत तक पहुचाया और उस के अनुसार आँ हज़रत (स) को ज़िम्मेदारी दी कि वह आयतों के शब्दों और उस के अर्थ को लोगों के सामने पढ़ें और उस के विषयों और मतलब को लोगों को समझाएँ और इस तरह अक़ीदे की बातें, समाजी और शहरी क़ानून और इंसानों की अपनी ज़िम्मेदारियों को, जिनका ज़िक्र क़ुरआने मजीद करता है, उस की तरफ़ दावत दें।

अल्लाह के इस मिशन का नाम पैग़म्बरी और नबुव्वत है। इस्लाम के नबी ने भी इस दावत में बिना किसी फेरबदल और कमी बेशी के अपनी ज़िम्मेदारी को निभाया।

वही और नबुव्वत के बारे में मौजूदा लिखने वालों की राय

इस युग के अधिकतर लेखक, जो विभिन्न मज़हबों और धर्मों के बारे में अध्ययन में कर रहे हैं, उन की राय क़ुरआनी वही और नबुवत के बारे में इस तरह हैं:

पैग़म्बरे अकरम (स) समाज के बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे जो इंसानी समाज को पतन, और ज़वाल से बचाकर उस को संस्कृति और आज़ादी के गहवारे में जगह देने के लिये उठ खड़े हुए थे ताकि समाज को अपने पाक और साफ़ विचार की तरफ़ यानी एक पूर्ण और मुकम्मल दीन की तरफ़ जो आपने ख़ुद मुरत्तब किया था, दावत दे।

कहते हैं कि आप बुलंद हिम्मत और पवित्र आत्मा के मालिक थे और एक अंधकारमय व तारीक माहौल में ज़िन्दगी बसर करते थे। जिसमें सिवाए ज़बरदस्ती, ज़ुल्म व सितम, झूठ और हरज मरज के अलावा और कोई चीज़ दिखाई नही देती थी और ख़ुद ग़र्ज़ी, चोरी, लूटपाट और दहशतगर्दी के अलावा कोई चीज़ मौजूद नही थी। आप हमेशा इन हालात से दुखी होते थे और जब कभी बहुत ज़्यादा तंग आ जाते थे तो लोगों से अलग होकर एक गुफ़ा में जो तिहामा के पहाड़ों में थी कुछ दिनों तक अकेले रहते थे और आसमान, चमकते हुए तारों, ज़मीन, पहाड़, समुन्दर और सहरा आदि जो प्रकृति के रुप हैं जो इंसान के वश में किये गये हैं, उन की तरफ़ टुकटुकी बाँध कर देखते रहते थे और इस तरह इँसान की ग़फ़लत और नादानी पर अफ़सोस किया करते थे जिसने इंसान को अपनी लपेट में ले रखा था ताकि उसे इस क़ीमती जीवन की ख़ुशियों और सफ़लताओं से दूर करके उन को दरिन्दों और जानवरों की तरह गिरी हुई ज़िन्दगी गुज़ारने पर मजबूर करे दे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) लगभग चालीस साल तक इस हालत को अच्छी तरह समझते रहे और मुसीबत उठाते रहे, यहाँ तक कि चालीस साल की उम्र में एक बहुत बड़ा मंसूबा बनाने में कामयाब हो गये ताकि इंसान इन बुरे हालात से निजात दिलाएँ जिसका नतीजा हैरानी, परेशानी, आवारगी, ख़ुदगर्ज़ी और बे राहरवी था और वह दीने इस्लाम था जो अपने ज़माने की आलातरीन और मुनासिब तरीन हुकूमत थी।

पैग़म्बरे अकरम (स) अपने पाक विचार को ख़ुदा का कलाम और ख़ुदा की वही तसव्वुर करते थे कि ख़ुदा वंदे आलम ने आप की पाक फ़ितरत रुह के ज़रिये आप से हमकलाम होता था और अपनी पाक और ख़ैर ख़्वाह रुह को जिस से यह अफ़कार निकलते थे आप के पाक दिल में समा जाते थे और उस को रुहुल अमीन जिबरईल, फ़रिशत ए वही कहते हैं। कुल्ली तौर पर ऐसी क़ुव्वतें जो ख़ैर और हर क़िस्म की खुशबख़्ती की तरफ़ दावत देती है उनको मलाएका और फ़रिश्ते कहा जाता है और वह क़ुव्वतें जो शर और बदबख़्ती की तरफ़ दावत देती हैं उन को शयातीन और जिन कहा जाता है। इस तरह पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने फ़रायज़ को नबुव्वत और रिसालत का नाम दिया, जो जम़ीर की आवाज़ के मुताबिक़ थे और उन के अनुसार इंसानों को इंक़ेलाब की दावत देते थे।

अलबत्ता यह वज़ाहत उन लोगों की है जो इस दुनिया के लिये एक ख़ुदा के अक़ीदे के क़ायल हैं और इंसाफ़ की रु से इस्लाम के दीनी निज़ाम के लिये महत्व के क़ायल हैं लेकिन वह लोग जो इस दुनिया के लिये किसी पैदा करने का अक़ीदा नही रखते हैं वह नबुव्वत, वही, आसमानी फ़रायज़, सवाब, अज़ाब, स्वर्ग और नर्क जैसी बातों को धार्मिक राजनिती और दर अस्ल मसलहत आमेज़ झूठ समझते हैं।

वह कहते हैं कि पैग़म्बर इस्लाह पसंद इंसान थे और उन्होने दीन की सूरत में इंसानी समाज की भलाई और बेहतरी के लिये क़वानीन बनाए और चुँकि गुज़िश्ता ज़माने के लोग जिहालत और तारीकी में ग़र्क़ और तवह्हुम परस्ती पर मबनी अक़ीदों के साए में मबदा और क़यामत को महफ़ूज़ रखा है।

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