उसूले दीन और तक़लीद का जायज़ न होना

उसूले दीन और तक़लीद का जायज़ न होना

हमारे समाज में बहुत से लोग उसूले दीन (धर्म का स्तंभ) पर ईमान रखते हैं और फ़ुरु ए दीन पर अमल करते हैं लेकिन उन में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो फ़ुरु ए दीन की तरह उसूले दीन में भी तक़लीद (अनुसरण) करते हैं यानी वह जिस तरह से नमाज़, रोज़े के मसअलों में किसी मुजतहिद की तक़लीद करते हैं उसी तरह तौहीद, अद्ल, नबुव्वत, इमामत और क़यामत के बारे में भी अपने बुज़ुर्गों की तक़लीद करते हैं और कहते हैं: क्योकि हमारे बाप दादा ने कहा है कि ख़ुदा एक है, आदिल है, हज़रत मुहम्मद (स) नबी है, इमाम बारह हैं और क़यामत आयेगी। इस लिये हम भी उन सब चीज़ों पर यक़ीन रखते हैं। लेकिन यह तरीक़ा बिल्कुल सही नही है, इसलिये कि उसूले दीन में तक़लीद जायज़ ही नही है।

हर इंसान के लिये ज़रुरी है कि वह उसूले दीन (तौहीद, अद्ल, नबुव्वत, इमामत और क़यामत) पर दलील के साथ ईमान रखें और सिर्फ़ इस बात पर बस न करें कि चुँकि हमारे बाप दादा मुसलमान हैं लिहाज़ा हम भी मुसलमान है।

अब सवाल यह है कि उसूले दीन को दलील के साथ जानने के लिए कितनी किताबों को पढ़ा जाये और कौन कौन सी मोटी मोटी किताबों का अध्ययन किया जाए? उस का जवाब यह है कि दलील जानने के लिए मोटी मोटी किताबों को पढ़ने की ज़रुरत नही है बल्कि इंसान सिर्फ़ आसान और सादा दलीलों को छोटी छोटी किताबों को पढ़ने या आलिमों से सवाल करने के ज़रिये जान ले तो यही काफ़ी है। हाँ अगर ज़्यादा जानना चाहता है तो बड़ी बड़ी किताबों को पढ़ना और इस सिलसिले में अध्ययन करना बेहद लाभदायक साबित होगा।

फ़िर यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि सादा और आसान दलील का तात्पर्य क्या है? किसी दलील के सादा और आसान होने का मापदंड क्या है?

इस के जवाब में हम आप के लिए एक मिसाल पेश करते हैं जिस से आप समझ सकते हैं कि सादा दलील क्या होती है। एक बुढ़िया चरख़ा चला रही थी, उसी हालत में उससे पूछा गया कि ख़ुदा है इसकी तुम्हारे पास क्या दलील है? तुम कैसे यक़ीन रखती हो कि कोई ख़ुदा है? उसने फ़ौरन चरख़े से हाथ हटा लिया जिस की वजह से चरख़ा रुक गया तो बुढ़िया ने कहा: जब यह छोटा सा चरख़ा बिना किसी चलाने वाले के नहीं चल सकता तो इतनी बड़ी दुनिया किसी चलाने वाले के बग़ैर किस तरह से चल सकती है? इस दुनिया का पूरे नज़्म के साथ चलते रहना इस बात की दलील है कि कोई ख़ुदा है जो उसे चला रहा है।

बुढ़िया के इस वाक़ेया से सादा और आसान दलील का मापदंड समझ में आ जाता है। अब हम से अगर कोई कहे कि ख़ुदा के वुजूद को साबित करो तो हम उसे यह जवाब दे सकते हैं कि हर चीज़ का कोई न कोई बनाने वाला होता है, हर चीज़ का कोई न कोई चलाने वाला होता है लिहाज़ा इतनी बड़ी दुनिया को चलाने वाला कोई न कोई ज़रुर है और वह ख़ुदा है।

नोट: हाँ अगर किसी दीनदार और विश्वस्नीय आलिमें दीन की बताई हुई दलील के आधार पर यक़ीन हासिल हो जाये तो उस यक़ीन के आधार पर उसूले दीन को स्वीकार कर सकता है और इसमें कोई आपत्ती भी नही है।

इस लिए कि क़ुरआने पाक में तक़लीद के बारे में काफ़िरों को बुरा भला कहा गया है वह उन के लिए यक़ीन हासिल न होने की वजह से है क्योकि वह गुमान और संभावनाओं के आधार पर कार्य करते थे जैसा कि इरशाद हो रहा है:

وَمَا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ

उन्हे इस का यक़ीन नहीं है बल्कि वह सिर्फ़ गुमान करते हैं। (सूरा जासिया आयत 24)

सारांश

-          उसूले दीन में तक़लीद जायज़ नही है बल्कि उन उसूल को सादा और आसान दलीलों के ज़रिये जानना ज़रुरी है लिहाज़ा हम यह नही कह सकते कि चुँकि तौहीद, अद्ल, नबुव्वत, इमामत और क़यामत पर हमारे बुज़ुर्गों को ईमान है लिहाज़ा हम भी उन पाँचों उसूलों पर ईमान रखते हैं।

-          सादा और आसान दलील की मिसाल, चरख़ा चलाने वाली बुढ़िया का वाक़ेया है जिस के पढ़ने के बाद मालूम हो जाता है कि सादा और आसान दलील का मापदंड क्या है।

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