क़ुरआन, इमामे अली अलैहिस्सलाम की निगाह में

क़ुरआन, इमामे अली अलैहिस्सलाम की निगाह में

सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

इमाम अली (अ0) की क़ुरआन की तौसीफ़, तबयीन और तौज़ीह दिल को छू लेने वाली है कभी कभी कलामे अली (अ0) क़ुरआन की अज़मत और उस के राज़ व रुमूज़ से परदा उठाने मे इस क़द्र बुलंदी पर पहुंच जाती है कि इंसान बिला इख़्तियार उस के सामने सर झुकाने को मजबूर हो जाता है।

क़ुरआन इमाम अली (अ0) की नज़र में दिलों की बहार है जिस से दिल व जान को तरावत बख़्शी जानी चाहिये। दर्द से शिफ़ा है कि जिस की राहनुमाई में बदी और बद बख़्ती, निफ़ाक़ व कुफ़्र और कज रफ़्तारी को सफ़्हऐ दिल से मिटा देना चाहिये आप फ़रमाते हैं: क़ुरआन की तालीम हासिल करो क्यों कि ये बेहतरीन गुफ़्तार है, इस मे ग़ौर व फ़िक्र करो कि ये दिल की बहार है इस के नूर से हिदायत हासिल करो कि ये दिलों के लिये शिफ़ा बख़्श है।

और फ़रमाते हैं: जान लो कि जिस के पास क़ुरआन है उस को किसी और चीज़ की ज़रूरत नही, और बिना क़ुरआन के कोई बे नयाज़ नही है, पस अपने दर्द की दवा क़ुरआन से करो और सख़्तियों में उस से मदद तलब करो इस लिये कि क़ुरआन बहुत बड़े अमराज़ यानी कुफ़्र, निफ़ाक़ तबाही व बर्बादी से बचाने वाला है।

उस वक़्त जब ज़माने में अरब के कलाम की तूती बोलती थी क़ुरआन नए उस्लूब और दिल रुबा अंदाज़ में नाज़िल हुआ और सब को तारीफ़ करने पर मजबूर कर दिया, इमाम अली (अ0) की इस मुहय्यरुल उक़ूल ख़ूबसूरती के बारे मे फ़रमाते हैं और हक़ तलब और हक़ाएक़े इलाही के बारे मे ग़ौर व फ़िक्र करने वाले को दावत देते हैं और बताते हैं कि क़ुरआन ला महदूद गहराई और ला मुतनाही दरया है:

बे शक क़ुरआन को ज़ाहिर ख़ूबसूरत और बातिन अमीक़ है इस के अजाएबात व ग़राएबात की इन्तेहा नही है और तारीकियां उस के बिना हटाई नही जा सकतीं

क़ुरआन की हक़ीक़ी मारिफ़त हासिल करने के लिये हम को क़ुरआन के दामन में पनाह लेना होगी, उस से तालीम हासिल करनी होगी, उस की नसीहतों से पंद हासिल करनी होगी, मुशकिलात व गिरफ़्तारियों में उस से मदद मांगनी होगी, और इन सब के लिये बसीरत व आगाही के साथ क़ुरआन से पूछना होगा और उस से जवाब लेना होगा।

सियूति लिखता है: ख़ोलफ़ा में सब से ज़्यादा तफ़सीरी रिवायात इमाम अली (अ0) से लक़्ल हुई हैं आज हमारे दरमियान जो हदीसी और तफ़सीरी मनाबे है वह,वह सब नही हैं जो इमाम अली (अ0) ने बयान किया है बल्कि इस बह्रे अज़ीम का एक क़तरा है जो हम तक पहुंच पाया है।

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ0) इमाम अली (अ0) से नक़्ल करते हैं: रूए ज़मीन पर अज़ाबे इलाही से बचाने वाली दो चीज़ें हैं, उन मे से एक उठा ली गई, इस लिये दूसरी से तमस्सुक अख़्तियार करो, जो उठा ली गई वह रसूले अकरम (स0) की ज़ात है, लेकिन जो हमारे दरमियान मौजूद है वह इस्तिग़फ़ार है। ख़ुदावंदे आलम फ़रमाता है: हालांकि अल्लाह उन पर उस वक़्त तक अज़ाब न करेगा जब तक पैग़म्बर आप उनके दरमियान हैं और ख़ुदा उन पर अज़ाब करने वाला नही है अगर ये तौबा और इस्तिग़फ़ार करने वाले हो जांयें।

सैय्यद रज़ी (नहजुल बलाग़ा के मुसन्निफ़) फ़रमाते हैं: ये क़ुरआन की एक बेहतरीन तफ़सीर है और क़ुरआन से एक लतीफ़ इस्तिमबात है कि जब इमाम अली (अ0) से इस आयत “बे शक अल्लाह अद्ल एह्सान और क़राबतदारों के हुक़ूक़ की अदाएगी का हुक्म देता है ” के बारे में सवाल किया गया तो आप ने जवाब दिया “अद्ल इन्साफ़ है और एह्सान नेकी है”

कलामे इमाम अली (अ0) की एक बहुत बड़ी ख़ुसूसियत कलामे इलाही से मिला होना और उस से इस्तिमबात करना है। जैसे कि आप ने मोआविया से जंग के लिये लश्कर को जमा करने के बाद एक ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया “ऐ मुसलमानों मोआविया जैसे ज़ालिम बैअत शिकन और ज़ुल्म की तरवीज करने वाले से जंग के लिये उठ खड़े हो! और मैं जो क़ुरआन से कह रहा हूं उस को सुनो और उस से नसीहत हासिल करो, गुनाहों से दूरी इख़्तियार करो, ख़ुदा ने तुम्हारे लिये दूसरी उम्मतों की सर गुज़श्त मे इबरत रखी है” फिर आप इस आयत की तिलावत करते हैं:क्या तुम ने मूसा (अ0) के बाद बनी इस्राईल की जमाअत को नही देखा जिस ने अपने नबी से कहा कि हमारे वासते एक बादशाह मुक़र्रर कीजिये ताकि हम राहे ख़ुदा मे जिहाद करें, नबी ने फ़रमाया कि अंदेशा ये है कि तुम पर जिहाद वाजिब हो जाए तो तुम जिहाद न करो, उन लोगों ने कहा कि हम क्यों कर जिहाद न करेंगे जब कि हमे हमारे घरों और बाल बच्चों से अलग निकाल कर बाहर कर दिया गया है.उस के बाद जब जिहाद वाजिब कर दिया गया तो थोड़े से अफ़राद के अलावा सब मुनहरिफ़ हो गए और अल्लाह ज़ालेमीन को ख़ूब जानता है।

उन के पैग़म्बर ने कहा कि अल्लाह ने तुम्हारे लिए तालूत को हाकिम मुक़र्रर किया है, उन लोगों ने कहा कि ये किस तरह हुकूमत करेंगे उन के पास तो माल की फ़रावानी नही है उन से ज़्यादा तो हम ही हक़दारे हुकूमत हैं. नबी ने जवाब दिया कि उन्हें अल्लाह ने तुम्हारे लिए मुन्तखब किया है और इल्म व जिस्म मे वुस्अत अला फ़रमाई है और अल्लाह जिसे चाहता है अपना मुल्क दे देता है कि वह साहिबे वुस्अत भी है और साहिबे इल्म भी।

ऐ लोगों इन आयात मे तुम्हारे लिए इबरत है ताकि तुम जान लो कि ख़ुदा ने ख़िलाफ़त व हुकूमत को अंबिया के बाद उन के ख़ानदान मे रखा है और तालूत को इल्म व क़ुदरत के ज़रिए दूसरों पर बरतरी बख़्शी है। अब ख़ूब ग़ौर करो कि ख़ुदा ने बनी उमय्या को बनी हाशिम पर बरतरी दी है? और मोआविया को इल्म व दानिश और क़ुदरत मे मुझ पर फ़ज़ीलत दी है? ऐ लोगो तक़्वा एख़्तियार करो और इस से पहले कि अजा़बे इलाही मे गिरफ़तार हो जाओ उस की राह मे जिहाद करो।

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