दुनिया इमाम अली (अ) की निगाह में
दुनिया इमाम अली (अ) की निगाह में
मैं तुम्हें दुनिया से ख़बरदार किये देता हूं कि यह एक ऐसे शख़्स की मंज़िल है जिस के लिये क़रार नहीं और ऐसा घर है जिस में आबो दाना नहीं ढूंढा जा सकता। यह अपने बातिल से आरास्ता है और अपनी आराइशों से धोका देती है। यह एक ऐसा घर है जो अपने रब की नज़रों में ज़लीलो ख़्वार है। चुनांचे उस ने हलाल के साथ हराम और भलाइयों के साथ बुराइयां और ज़िन्दगी के साथ मौत और शीरीनियों (मिठासों) के साथ तल्ख़ियां (कड़वाहटें) ख़ल्त मल्त (मिश्रित) कर दी हैं और अपने दोस्तों के लिये उसे बे ग़ुल व ग़श नहीं रखा और न दुश्मनों के देने में बुख्ल (कंजूसी) किया है।
इस की भलाइयां बहुत ही कम हैं और बुराइयां जहां चाहो मौजूद (विद्यामान)। इस की जमअ पूंजी ख़त्म हो जाने वाली, और इस का मुल्क छिन जाने वाला और इस की आबादियां वीरान हो जाने वाली हैं। भला उस घर में ख़ैरो ख़ूबी ही क्या हो सकती है जो मिस्मार इमारत (ध्वस्त भवन) की तरह गिर जाए, और उस उम्र में जो ज़ादे राह की तरह ख़त्म हो जाए, और उस मुद्दत में जो चलने फिरने की तरह तमाम हो जाए जिन चीज़ों की तुम्हें तलब व तलाश रहती है, उनमें अल्लाह तआला के फ़रायज़ (कर्तव्यों) को भी दाखिल कर लो, और जो अल्लाह नेतुम से चाहा है उसे पूरा करने की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) भी उस से मांगो। मौत का पैग़ाम आने से पहले मौत की पुकार अपने कानों को सुना दो। इस दुनिया में ज़ाहिदों के दिल रोते हैं, अगरचे वह हंस रहे हों। और उनका ग़मो अन्दोह हद से बढ़ा होता है, अगरचे उन के चेहरों से मसर्रत (ख़ुशी) टपक रही हो। और उन्हें अपने नफ़्सों से इन्तिहाई बैर होता है, अगरचे उस रिज़्क़ (जीविका) की वजह से, जो उन्हें मयस्सर है, उन पर रश्क किया जाता हो।
तुम्हारे दिलों से मौत की याद जाती रही है और झूटी उम्मीदें तुम्हारे अन्दर मौजूद हैं। आख़िरत से ज़ियादा दुनिया तुम पर छाई हुई है और वह उक़बा (यमलोक) से ज़ियादा तुम्हें अपनी तरफ़ ख़ींचती है। तुम दीने खुदा के सिलसिले में एक दूसरे के भाई भाई हो। लेकिन बद नीयती और बद ज़नी ने तुम में तफ़रिक़ा (फूट) डाल दिया है। न तुम एक दूसरे का बोझ बटाते हो न बाहम पन्दो नसीहत (परस्पर प्रवचन एवं उपदेश) करते हो, न एक दूसरे पर कुछ ख़र्च करते हो, न तुम्हें एक दूसरे की चाहत है। थोड़ी सी दुनिया पा कर ख़ुश होने लगते हो, और आख़िरत के बेशतर हिस्से से भी महरुमी तुम्हें ग़मज़दा नहीं करती। ज़रा सी दुनिया का तुम्हारे हाथों से निकलना तुम्हें बेचैन कर देता है।
यहां तक कि बेचैनी तुम्हारे चेहरों से ज़ाहिर होने लगती है और ख़ोई हुई चीज़ पर तुम्हारी बे सबरियों से आशकारा हो जाती है। गोया यह दुनिया तुम्हारा मुस्तक़िल मक़ाम है और दुनिया का साज़ो बर्ग हमेशा रहने वाला है। तुम में से किसी को भी अपने किसी भाई का ऐसा ऐब उछालने से कि जिस के ज़ाहिर होने से डरता है, सिर्फ़ यह उम्र माने होती है कि वह भी उस का वैसा ही ऐब उस के सामने खोल कर रख देगा। तुमने आख़िरत को ठुकराने और दुनिया को चाहने पर समझौता कर रखा है।
तो लोगों का दीन तो यह रह गया है कि जैसे एक दफ़्आ ज़बान से चाट लिया जाए अर्थात सिर्फ़ ज़बानी इक़रार, और तुम तो उस शख़्स की तरह मुत्मइन (संतुष्ट) हो चुके हो कि जो अपने काम धँधों से फ़ारग़ हो गया हो और अपने मालिक की रज़ामन्दी हासिल कर ली हो।
(नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 111)
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