दिल लगाने की सज़ा
दिल लगाने की सज़ा
इमाम सादिक़ (अ) ने दुनिया से दिल लगाने के बारे में फ़रमायाः
एक दिन हज़रत ईसा (अ) अपने हवारियों के साथ टहल रहे थे चलते चलते वह एक गांव के पास पहुंचे तो क्या देखा कि उस गांव के सारे लोग रास्ते और घरों में मरे हुए पड़े थे।
आपने फ़रमाया कि यह लोग अपनी मौत नहीं मरे हैं, अवश्य ही इन पर ईश्वर का क्रोध आया है और यह इस हालत में पहुंचे हैं।
हज़रत ईसा के साथियों ने कहा काश हमको पता चल सकता कि इनकी यह हालत कैसे हुई?
हज़रत ईसा पर वही हुई की इन मुर्दों के बीच आवाज़ लगाओ, इनमें से एक तुम्हारी बातों का उत्तर देगा, आपने आवाज़ लगाईः हे इस गांव के रहने वालों
उनमें से एक ने उत्तर दियाः हां। हे रूहुल्लाह।
आपने पूछाः तुम्हारी कहानी क्या है, तुम क्यों इस हालत में पहुंचे हो?
उसने उत्तर दियाः एक दिन सुबह को हम सब सुकून और सम्पन्नता के साथ उठे और शाम को सबके सब हाविया पहुंच गए।
हज़रत ईसाः यह हाविया क्या है?
कहाः हाविया आग का दरिया है जिसमें आग के पहाड़ हैं।
हज़रत ईसाः तुम क्यों इस अज़ाब में गिरफ़्तार हुए?
कहाः حب الدنیا و عبادة الطاغوت
हमारा जुर्म दुनिया से बहुत अधिक दिल लगाना और बातिल एवं ताग़ूत की इबादत करना था, जिसके कारण हम इस हाल को पहुंचे हैं।
हज़रत ईसाः तुम्हें दुनिया से कितनी मोहब्बत थी?
कहाः जितना एक बच्चा अपनी मां के दूध से रखता है, जब भी दुनिया हम को मिलती थी तो हम प्रसन्न होते थे और जब हम से छिन जाती थी तो दुखी होते थे।
हज़रत ईसाः ताग़ूत और ज़ालिम का कितना अनुसरण करते थे?
कहाः वह जो भी कहते थे हम मानते और करते थे।
हज़रत ईसाः इन सारे लोगों में से केवल तुम्हीं ने क्यों मेरी आवाज़ पर उत्तर दिया?
कहाः दूसरों के मुंह को आग की लगामों से बांध दिया गया है और भयानक फ़रिश्ते उनको अज़ाब कर रहे हैं, मैं उनके बीच रहता था, लेकिन उनके व्यवहार और आचरण का अनुसरण नहीं करता था, मैंने दुनिया से बहुत अधिक दिल नहीं लगाया था, और मैं ताग़ूत की इबादत नहीं करता था, बातिल की पूजा नहीं करता था, लेकिन जब ईश्वर का अज़ाब आया तो उसने अच्छे बुरे सबको घेर लिया और ख़ुश्क एवं तर सबको जला दिया, और मैं भी अज़ाब में गिरफ़्तार हो गया। और अब में नर्क के किनारे एक बाल पर टंगा हूं और डरता हूं कि नर्क की आग में न गिर जाऊँ।
हज़रत ईसा ने अपने साथियों से कहाः
ان النوم علی المزابل واکل خبز خیر کثیر مع السلامة الدین
जौ की रोटी का खाना और ख़राब स्थान पर सोना और सख़्ती एवं परेशानी में जीवन व्यतीत करना दीन की सलामती के साथ हो तो बहुत अच्छा है, और यह बेहतर हैं अच्छी दुनिया और ख़राब दीन से।
(बिहारुल अनवार जिल्द 14, पेज 322)
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